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अशांति का नया अध्याय

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नोटबंदी : सनक या रणनीति

इलियट का एक कथन है -‘‘सभी तरह की भूलों में, भविष्यवाणी करना सबसे ज्यादा गैर-जरूरी है।’’ शायद यही वजह है कि दायित्वों से बंधे लोग भविष्यवाणी करने से बचते रहते हैं। भारत में वैसे भी ऋषियों-मुनियों या देवताओं की तरफ से ही भविष्यवाणी की गयी नेतृत्व की तरफ से नहीं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बात को नहीं समझ सके इसलिए उन्होंने एक नहीं बल्कि कई भविष्यवाणियां कीं जिनके परिणामों पर सरकार स्वयं ही टिक कर तथ्यात्मक जवाब दे पाने असमर्थ दिख रही है। इन भविष्यवाणियों में कुछ 8 नवम्बर 2016 के उस निर्णय से भी जुड़ी हैं, जिसे विमुद्रीकरण (डिमॉनीटाइजेशन) नाम दिया गया था। प्रधानमंत्री का यह निर्णय और इससे जुड़ी भविष्यवाणियां ऐसी थीं, जिसके कारण देश बहुत तकलीफ से गुजरा। लोगों ने शृद्धापूरक या विवशतावश इसे इस उम्मीद से सहा कि जल्द ही कोई बहुत बड़ा लाभ उन्हें और देश को होने वाला है। लेकिन अब स्थिति साफ हो चुकी है कि वे घोषणाएं आधारहीन थीं और वह निर्णय गलत। 8 नवम्बर 2017 को जब प्रधानमंत्री ने 500 और 1000 के नोटों को गैर-काननी मुद्रा घोषित करते हुए घोषणा की थी कि मध्यरात्रि से ये नोट काग…

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पैदाइशी किस्मत बदल चुकी है-जिस तरह भूगोल और प्रतिभा का पूरा सम्बंध बदल चुका है। तीस साल पहले अगर आपके पास विकल्प होता कि आप बॉम्बे या शंघाई के किसी उपनगरीय क्षेत्र में एक जीनियस के रूप में पैदा होते या फिर अमेरिका में एक औसत आदमी के रूप में, तो आपके फलने-फूलने और अच्छी जिंदगी बिताने की उम्मीद अमेरिका में ज्यादा थी। लेकिन दुनिया के समतल होने क साथ बड़ी संख्या में लोग कम्प्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग कर सकते हैं। प्राकृतिक प्रतिभा भूगोल पर भारी पड़ने लगी है। यह सच है कि लेकिन क्या वास्तव में बिल गेट्स अमेरिका के उच्च कोटि के शहरों की बजाय शंघाई या मुंबई जैसे शहरों में रहना पसंद करेंगे? या फिर वे इन शहरों को अपने बिजनेस मॉडल के लिहाज से श्रेष्ठ बताने का प्रयास कर रहे हैं? यह हमें और आपको तय करना है। कारण यह है कि हम ऐसे वक्तव्यों की छानबीन किए बिना ही ऐसे वक्तव्यों को आत्ममुग्धता का आधार बना लेते हैं और विकास व जीवतंतापूर्ण शैली के सभी प्रतिमान इस तरह से हमारे पाले में आ जाते हैं। दरअसल इस तरह का निष्कर्ष भी आभासी दुनिया की तरह होते हैं जो क्लिक एण्ड ब्राउजिंग के साथ प्रकट होते चलते हैं। द…

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