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September, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मनावैज्ञानिक धरातल बदलने की जरूरत

अध्यात्मिक चिंतन, कर्म एवं प्रेममय जीवन, सभ्यताओं का समन्वय और सम्पूर्णत्रुटियों से मनुष्य की अवस्था के निर्माण की बात जैसे ही मस्तिष्क में आती है, डा. राधाकृष्णन वैसे ही पूरे मनोवैज्ञानिक धरातल पर सहज ही उतर आते हैं। डा. राधाकृष्णन का पूरा चिंतन उनकी जिन रचनाओं में प्राणवायु बनकर प्रवाहित हो रहा है वे हैं- इंडियन फिलासोफी, दि व्यू आॅफ लाइफ, ईस्टर्न रिलीजन एवं वेस्टर्न थाट, एन आइडियलिस्ट व्यू आॅफ लाइफ, एजूकेशन पालिटिक्स एंड वार , दि कान्सेप्ट आॅफ मैन, माई सर्च फाॅर ट्रुथ आदि। शैक्षिक संक्रियाओं और शैक्षिक रचनाधर्मिता चिंतन से उद्भूत होती है सो डा. कृष्णन के दार्शनिक पक्ष से अंशतः ही सही पर परिचित हुए बगैर उनके शिक्षक के व्यक्तित्व को समझ पाना मुश्किल होगा। वे मनुष्य को न केवल परफेक्ट मैन या कम्पलीट मैन की ओर ही नहीं ले जा रहे थे बल्कि उसके लिए एक ऐसे समृद्ध विश्व की संरचना भी निर्मित कर रहे थे जिसमें सभी मनुष्य एक ही परिवार के सदस्य हों। उनकी यह संरचना उस वैज्ञानिक युग के कारण संभव हो रही थी जिसमें किसी न किसी प्रकार से विज्ञान विभिन्न राष्ट्रों को नजदीक लाने में अहम भूमिका निभा …