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August, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लेकतंत्र को जिंदा रहने दो

जब हमारे देश के प्रधानमंत्री शाहजहाँनाबाद यानी लाल किले की प्राचीर से किसी तरह से पढ़-पढ़कर लोगों को अपनी बात बता रहे थे, तो बार-बार मन स्वयं से यह प्रश्न कर रहा था कि क्या यही है नेहरू और गांधी जी की विरासत ? उनकी वाणी की शक्ति उनका साथ देने में असमर्थ दिख रही थे, उनके चेहरे पर स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ का खुशी कम बल्कि चिंता के बल अधिक थे.....वह चिंता जिसके जिम्मेदार एक संवैधानिक व्यवस्था के प्रमुख होने के नाते बहुत हद तक वे स्वयं हैं। इस दृष्टि से देखें तो भ्रम की स्थिति बनती है कि हम इन 64वर्षों में कुछ शक्ति बटोर ताकतवर बने या फिर इतने निर्बल कि हमारा नेतृत्व सीधे अपने पैरों पर खड़ा होने में असमर्थ साबित हो रहा है। आज नेतृत्व अपने देश के लोगों को असंवैधानिक भाषा में और असंवैधानिक व अमर्यादित आचरण द्वारा लगातार सीख देने प्रहसन बार-बार दोहरा रहा है। अनशन करना, जनमत लेने की बात करना सरकार और उसके मीडियाई चेहरों को असंवैधानिक लगता है। उसके कुछ चारणी नुमाइंदे अन्ना जैसे कुछ भारतीयों से यह पूछने लगे कि वे हैं कौन ? यह सवाल तो साम्राज्यवादियों ने गांधी जी से भी नहीं पूछा था और न ही ग…