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सीरिया का काउंट डाउन

सीरिया में सत्ताधारियों और सुधारवादियों के बीच संघर्ष जिस हिंसात्मक दौर में पहुंच गया है, और जिस तरह से वैश्विक दबाव एक आकार लेता दिखाई दे रहा है, उससे तो यही लगता है कि राष्ट्रपति बशर अल असद की भी उलटी गिनती शुरू हो गई है। सीरियाई राष्ट्रपति इसके उलट यह धमकी देते दिख रहे हैं कि उनके देश में किसी भी प्रकार की पश्चिमी सैन्य कार्रवाई भूकंप ला सकती है। इसे क्या माना जाए, उनका आत्मविश्वास या फिर अतिवादिता अथवा नासमझी? सीरियाई राष्ट्रपति ने द संडे टेलीग्राफ को दिए साक्षात्कार में यह स्वीकार किया कि पश्चिमी सेनाओं का हम पर दवाब बढ़ रहा है, लेकिन किसी भी हस्तक्षेप से सीरिया एक और अफगानिस्तान में बदल सकता है। उनका कहना था कि इस क्षेत्र में सीरिया मुख्य केंद्र है, इसलिए यदि सीरिया में कोई समस्या होती है तो इसका असर पूरे इलाके पर पड़ेगा। उनका कहना था कि मिस्त्र और ट्यूनीशिया से सीरिया की स्थिति भिन्न है, इसकी राजनीति और इतिहास बिलकुल भिन्न हैं।
उनका यह बयान तब आया, जब सरकार विरोधी सीरियाइयों ने लीबिया की तरह सीरिया को नो फ्लाई जोन घोषित करने की मांग की और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सीरिया में दम…

मनावैज्ञानिक धरातल बदलने की जरूरत

अध्यात्मिक चिंतन, कर्म एवं प्रेममय जीवन, सभ्यताओं का समन्वय और सम्पूर्णत्रुटियों से मनुष्य की अवस्था के निर्माण की बात जैसे ही मस्तिष्क में आती है, डा. राधाकृष्णन वैसे ही पूरे मनोवैज्ञानिक धरातल पर सहज ही उतर आते हैं। डा. राधाकृष्णन का पूरा चिंतन उनकी जिन रचनाओं में प्राणवायु बनकर प्रवाहित हो रहा है वे हैं- इंडियन फिलासोफी, दि व्यू आॅफ लाइफ, ईस्टर्न रिलीजन एवं वेस्टर्न थाट, एन आइडियलिस्ट व्यू आॅफ लाइफ, एजूकेशन पालिटिक्स एंड वार , दि कान्सेप्ट आॅफ मैन, माई सर्च फाॅर ट्रुथ आदि। शैक्षिक संक्रियाओं और शैक्षिक रचनाधर्मिता चिंतन से उद्भूत होती है सो डा. कृष्णन के दार्शनिक पक्ष से अंशतः ही सही पर परिचित हुए बगैर उनके शिक्षक के व्यक्तित्व को समझ पाना मुश्किल होगा। वे मनुष्य को न केवल परफेक्ट मैन या कम्पलीट मैन की ओर ही नहीं ले जा रहे थे बल्कि उसके लिए एक ऐसे समृद्ध विश्व की संरचना भी निर्मित कर रहे थे जिसमें सभी मनुष्य एक ही परिवार के सदस्य हों। उनकी यह संरचना उस वैज्ञानिक युग के कारण संभव हो रही थी जिसमें किसी न किसी प्रकार से विज्ञान विभिन्न राष्ट्रों को नजदीक लाने में अहम भूमिका निभा …

लेकतंत्र को जिंदा रहने दो

जब हमारे देश के प्रधानमंत्री शाहजहाँनाबाद यानी लाल किले की प्राचीर से किसी तरह से पढ़-पढ़कर लोगों को अपनी बात बता रहे थे, तो बार-बार मन स्वयं से यह प्रश्न कर रहा था कि क्या यही है नेहरू और गांधी जी की विरासत ? उनकी वाणी की शक्ति उनका साथ देने में असमर्थ दिख रही थे, उनके चेहरे पर स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ का खुशी कम बल्कि चिंता के बल अधिक थे.....वह चिंता जिसके जिम्मेदार एक संवैधानिक व्यवस्था के प्रमुख होने के नाते बहुत हद तक वे स्वयं हैं। इस दृष्टि से देखें तो भ्रम की स्थिति बनती है कि हम इन 64वर्षों में कुछ शक्ति बटोर ताकतवर बने या फिर इतने निर्बल कि हमारा नेतृत्व सीधे अपने पैरों पर खड़ा होने में असमर्थ साबित हो रहा है। आज नेतृत्व अपने देश के लोगों को असंवैधानिक भाषा में और असंवैधानिक व अमर्यादित आचरण द्वारा लगातार सीख देने प्रहसन बार-बार दोहरा रहा है। अनशन करना, जनमत लेने की बात करना सरकार और उसके मीडियाई चेहरों को असंवैधानिक लगता है। उसके कुछ चारणी नुमाइंदे अन्ना जैसे कुछ भारतीयों से यह पूछने लगे कि वे हैं कौन ? यह सवाल तो साम्राज्यवादियों ने गांधी जी से भी नहीं पूछा था और न ही ग…