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जिन पर हमें शर्म आती है

चाणक्य ने लिखा था कि जो लोग सच बोलना नही जानते वे वर्तमान भले ही सुधार लें लेकिन वे भविष्य बिगाड़ लेते हैं। आज भारत में एक अजीब सी प्रतियोगिता चल रही जिसका शीर्षक भले ही बहस के नाम का दिया जाता हो लेकिन असल में वह द्वंद होता ही। यह द्वंद ही जाति के अहम् का , यह द्वंद है धर्मं के इतिहास और श्रेष्ठता का , यह द्वंद स्वयं के लाभ कि पिपासु जिजीविषा का --------- इस सबने राष्ट्रीयता को इस कदर उधेडना शुरू कर दिया है कि उसका अपना सौंदर्य अब वीभत्सता में बदल गया। दिक्कत इस बात कि है कि ऐसा केवल हमारे राजनीतिज्ञ करते तो समझ में आ जाता क्योंकि उन्हें राजनीतिक लाभ चाहिए लेकिन ऐसा जब विश्व विद्यालयों में बैठे वे महानुभाव कर रहे है जिन्हें ऐसे करते हुए जरा सी शर्म नहीं आती । लेकिन देश के सामान्य नागरिक को उनसे घिन आती है। लिकिन यह वर्ग तो सभी जगह प्रभावी है सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर बौधिक प्रतिष्ठान तक में । इसने उन लोगों कि लिए कोई गुन्जाइस ही नहीं छोड़ी जो एक ईमानदार पहल कर सकते थे । किसी को जाति के नाम पर विशेषाधिकार चाहिए तो किसी को धर्मं के नाम पर . योग्यताएं तो अब मुह छुपाते फिर रही हैं क्य…