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May, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

डूबती-उतराती विरासतों के सहारे एक देश

बड़े दिनों से एक पाठ भारतीयों को रटाने की कोशिश की जा रही है की हम जल्दी ही दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनने वाले हैं । किसी भारतीय के लिए इससे अधिक गर्व की बात और क्या हो सकती है, लेकिन एक बात समझ में नहीं आती की यदि ऐसा सही है तो ८३६ मिलियन भारतीय २० रुपये से कम आमदनी पर जीवन यापन करने का अभिशाप क्यों भोग रहे हैं ? यह बात किसी पूर्वाग्रह से सम्पन्न होकर नहीं कही जा रही है बल्कि २००७ के असंगठित क्षेत्र के उद्योगों के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में यह बात स्वीकार की है । जिस देश की ७७ प्रतिशत आबादी भर पेट भोजन के लिए तरस रही हो वह विकसित कहने का नैतिक अधिकार तो नहीं रखता । मानव विकास सूचकांक पर नज़र डालें तो हम काफी पीछे हो चुके हैं। भारत इस स्केल पर श्रीलंका और भूटान जैसे देश से पीछे खिसक कर १३२ वें पायदान पर पहुँच चुका है , ब्राजील , इंडोनेशिया, चाइना और साउथ कोरिया की तो बात ही छोड़ दीजिये । विश्व बैंक द्वारा निर्धारित ग्लोबल पावर्टी लाइन के आधार पर ४५६ मिलियन यानि ४२ प्रतिशत भारतीय गरीबी रेखा के नीचे हैं । इस हिसाब से दुनिया का हर तीसरा गरीब भारत में निवास करता है। इसक…