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April, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

विभ्रम की मनोदशा

राजनीतिज्ञ और बद्धिजीवी कहते हैं कि वोट जरूर दो, बिना किसी झिझक के क्योंकि लोकतंत्र में हमारा यह पवन दायित्व है, जिसकी पूर्ति हमें कोई भी आहुति देकर करनी चाहिए । लेकिन मैंने जब महात्मा को पढ़ा था तो एक बात जो सबसे अच्छी लगी थी वह यह, कि कोई कार्य ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे अपने ही ऊपर हिंसा हो ।
गौर से देखें तो अन्तःदलीय लोकतंत्र समाप्त हो गया है और राजनीतिक विचारधारा पूरी तरह से मर चुकी है । अब मरी हुई विचारधारा के अनजान नुमाइंदों में से किसी एक को चुनना क्या मेरी प्रतिबद्धता होनी चाहिए ? अगर उत्तर हाँ में है तो फिर मै समझ लूँगा कि हमारे देश के होनहारों ने गाँधी जैसे महात्मा की सही मायने में हत्या कर दी और मध्यकालीन या गुलामी कि मानसिकता वाले तत्वों की पुनः प्रतिष्ठा कर दी जिनके विरुद्ध गाँधी जैसे महात्मा करो या मरो भी कहने में कोई संकोच नही कर पाए । थोडी देर के लिए हिंसा कि इस शब्दावली से भी उन्होंने मुंह फेर लिया।
सवाल यह उठता है कि आख़िर ६ दशक के लोकतंत्र में हम ऐसे मुकाम पर क्यों पहुँच गए जहाँ हमें अधिकांश छल कपट करने वाले नेताओं से सामना करने को विवश होना पड़ रहा है। विचारधारा क…