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January, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मूल्यों के खात्मे के गुनाहगार

पूरी दुनिया आज मंदी की चपेट में है , सभी देख भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं । सरकारें भ्रष्ट मुनाफाखोरों के लिए धन वर्षा कर रही हैं और आम आदमी एक- एक रोटी के लिए तरस रहा है । समझ में नही आता की सरकारें लोगों के लिए हैं या फिर भ्रष्ट धनियों के लिए ? अमेरिका अरबों डॉलर पूंजीपतियों और उनकी भ्रष्ट निकम्मी संस्थाओं के लिए दान दे चुका है, यही हाल भारत जैसे समाजवादी संविधान को अपनाने वाले देश का भी है । अफ़सोश यह की २३१ मिलियन लोग भूख से मरने के लिए मजबूर हैं । उड़ीसा , मध्य प्रदेश , बिहार , छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों की स्थिति अफ्रीका के इथियोपिया और चाड जैसी है फिर भी हम गल बजा रहे हैं की हम २०२५ में दुनिया की महाशक्ति बन जायेगे। जानते हो यह कौन कर रहा है वही वर्ग और उसकी नीतियां जो जीरो मुनाफा वाली कम्पनियों को हीरो बन रहे थे। पता नही यह मुनाफा की संस्कृति इस दुनिया को कहा ले जायेगी। और तो और जो मार्क्स की घुट्टी पी कर बड़े ही वे भी अब स्मिथ और सैम की व्हिस्की पी कर मस्त हो रहे हैं । पिछले दिनों एक खुलासा पूंजीवादियों की चोरी का हुआ जिसमे जर्मनी की सीमेंस जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दुनिया भर…

बेईमान पूँजीवाद, निखट्टू नेतृत्व और प्रतिबंधित लोग

पिछले दिनों पॉल क्रुगमैन ने अपने एक लेख में लिखा था ,'' बड़े लोगों के बीच भी उस शख्स को आदर्श मानने की फितरत होती है जो खूब सारा पैसा बना रहा हो।'' यही बात पिछले दिनों एक चीनी अखबार में दो विद्वानों चिंग कुआन ली और मार्क्स सेल्डन ने लिखी थी । इन दोनों ने लिखा था कि चीन ने पिछले तीन दशकों में जो प्रगति कि है उसमे चीनी युवाओं को सिर्फ़ यह प्रशिक्षण दिया गया है कि सफलता कि पूजा करो। इस सफलता से उनका मतलब सिर्फ़ धनी बनने से है क्योंकि उनकी नज़र में प्रसिद्धी पाने के लिए धनी बनना आवश्यक है। इसका मतलब तो यही हुआ कि धनी होते ही सारे दुर्गुण छुप जाते हैं यानि धन संपन्नता वह योग्यता है जो काले धब्बों की सर्जरी कर देती है। यही कारण है कि आज निश्चित - अनिश्चित स्रोतों से धन अर्जन कराने वाले अब समाज का आइना बन गए हैं। वह चाहे संसद में घूस लेने वाले संसद हों या घूस देकर प्रधान मंत्री की कुर्सी बचाने वाले हमारे राजनीतिक नायक या फ़िर बड़े अपराधी अथवा कारपोरेट क्रिमिनल्स। अब यही हमारे लम्बरदार /नम्बरदार हैं और सभी जन इन्हीं के चरणों की रज लेकर मोक्ष पाना चाहते हैं। १९७० के दशक में पूंजीव…