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जिन पर हमें शर्म आती है

चाणक्य ने लिखा था कि जो लोग सच बोलना नही जानते वे वर्तमान भले ही सुधार लें लेकिन वे भविष्य बिगाड़ लेते हैं। आज भारत में एक अजीब सी प्रतियोगिता चल रही जिसका शीर्षक भले ही बहस के नाम का दिया जाता हो लेकिन असल में वह द्वंद होता ही। यह द्वंद ही जाति के अहम् का , यह द्वंद है धर्मं के इतिहास और श्रेष्ठता का , यह द्वंद स्वयं के लाभ कि पिपासु जिजीविषा का --------- इस सबने राष्ट्रीयता को इस कदर उधेडना शुरू कर दिया है कि उसका अपना सौंदर्य अब वीभत्सता में बदल गया। दिक्कत इस बात कि है कि ऐसा केवल हमारे राजनीतिज्ञ करते तो समझ में आ जाता क्योंकि उन्हें राजनीतिक लाभ चाहिए लेकिन ऐसा जब विश्व विद्यालयों में बैठे वे महानुभाव कर रहे है जिन्हें ऐसे करते हुए जरा सी शर्म नहीं आती । लेकिन देश के सामान्य नागरिक को उनसे घिन आती है। लिकिन यह वर्ग तो सभी जगह प्रभावी है सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर बौधिक प्रतिष्ठान तक में । इसने उन लोगों कि लिए कोई गुन्जाइस ही नहीं छोड़ी जो एक ईमानदार पहल कर सकते थे । किसी को जाति के नाम पर विशेषाधिकार चाहिए तो किसी को धर्मं के नाम पर . योग्यताएं तो अब मुह छुपाते फिर रही हैं क्य…

डूबती-उतराती विरासतों के सहारे एक देश

बड़े दिनों से एक पाठ भारतीयों को रटाने की कोशिश की जा रही है की हम जल्दी ही दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनने वाले हैं । किसी भारतीय के लिए इससे अधिक गर्व की बात और क्या हो सकती है, लेकिन एक बात समझ में नहीं आती की यदि ऐसा सही है तो ८३६ मिलियन भारतीय २० रुपये से कम आमदनी पर जीवन यापन करने का अभिशाप क्यों भोग रहे हैं ? यह बात किसी पूर्वाग्रह से सम्पन्न होकर नहीं कही जा रही है बल्कि २००७ के असंगठित क्षेत्र के उद्योगों के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में यह बात स्वीकार की है । जिस देश की ७७ प्रतिशत आबादी भर पेट भोजन के लिए तरस रही हो वह विकसित कहने का नैतिक अधिकार तो नहीं रखता । मानव विकास सूचकांक पर नज़र डालें तो हम काफी पीछे हो चुके हैं। भारत इस स्केल पर श्रीलंका और भूटान जैसे देश से पीछे खिसक कर १३२ वें पायदान पर पहुँच चुका है , ब्राजील , इंडोनेशिया, चाइना और साउथ कोरिया की तो बात ही छोड़ दीजिये । विश्व बैंक द्वारा निर्धारित ग्लोबल पावर्टी लाइन के आधार पर ४५६ मिलियन यानि ४२ प्रतिशत भारतीय गरीबी रेखा के नीचे हैं । इस हिसाब से दुनिया का हर तीसरा गरीब भारत में निवास करता है। इसक…

विभ्रम की मनोदशा

राजनीतिज्ञ और बद्धिजीवी कहते हैं कि वोट जरूर दो, बिना किसी झिझक के क्योंकि लोकतंत्र में हमारा यह पवन दायित्व है, जिसकी पूर्ति हमें कोई भी आहुति देकर करनी चाहिए । लेकिन मैंने जब महात्मा को पढ़ा था तो एक बात जो सबसे अच्छी लगी थी वह यह, कि कोई कार्य ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे अपने ही ऊपर हिंसा हो ।
गौर से देखें तो अन्तःदलीय लोकतंत्र समाप्त हो गया है और राजनीतिक विचारधारा पूरी तरह से मर चुकी है । अब मरी हुई विचारधारा के अनजान नुमाइंदों में से किसी एक को चुनना क्या मेरी प्रतिबद्धता होनी चाहिए ? अगर उत्तर हाँ में है तो फिर मै समझ लूँगा कि हमारे देश के होनहारों ने गाँधी जैसे महात्मा की सही मायने में हत्या कर दी और मध्यकालीन या गुलामी कि मानसिकता वाले तत्वों की पुनः प्रतिष्ठा कर दी जिनके विरुद्ध गाँधी जैसे महात्मा करो या मरो भी कहने में कोई संकोच नही कर पाए । थोडी देर के लिए हिंसा कि इस शब्दावली से भी उन्होंने मुंह फेर लिया।
सवाल यह उठता है कि आख़िर ६ दशक के लोकतंत्र में हम ऐसे मुकाम पर क्यों पहुँच गए जहाँ हमें अधिकांश छल कपट करने वाले नेताओं से सामना करने को विवश होना पड़ रहा है। विचारधारा क…

मूल्यों के खात्मे के गुनाहगार

पूरी दुनिया आज मंदी की चपेट में है , सभी देख भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं । सरकारें भ्रष्ट मुनाफाखोरों के लिए धन वर्षा कर रही हैं और आम आदमी एक- एक रोटी के लिए तरस रहा है । समझ में नही आता की सरकारें लोगों के लिए हैं या फिर भ्रष्ट धनियों के लिए ? अमेरिका अरबों डॉलर पूंजीपतियों और उनकी भ्रष्ट निकम्मी संस्थाओं के लिए दान दे चुका है, यही हाल भारत जैसे समाजवादी संविधान को अपनाने वाले देश का भी है । अफ़सोश यह की २३१ मिलियन लोग भूख से मरने के लिए मजबूर हैं । उड़ीसा , मध्य प्रदेश , बिहार , छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों की स्थिति अफ्रीका के इथियोपिया और चाड जैसी है फिर भी हम गल बजा रहे हैं की हम २०२५ में दुनिया की महाशक्ति बन जायेगे। जानते हो यह कौन कर रहा है वही वर्ग और उसकी नीतियां जो जीरो मुनाफा वाली कम्पनियों को हीरो बन रहे थे। पता नही यह मुनाफा की संस्कृति इस दुनिया को कहा ले जायेगी। और तो और जो मार्क्स की घुट्टी पी कर बड़े ही वे भी अब स्मिथ और सैम की व्हिस्की पी कर मस्त हो रहे हैं । पिछले दिनों एक खुलासा पूंजीवादियों की चोरी का हुआ जिसमे जर्मनी की सीमेंस जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दुनिया भर…

बेईमान पूँजीवाद, निखट्टू नेतृत्व और प्रतिबंधित लोग

पिछले दिनों पॉल क्रुगमैन ने अपने एक लेख में लिखा था ,'' बड़े लोगों के बीच भी उस शख्स को आदर्श मानने की फितरत होती है जो खूब सारा पैसा बना रहा हो।'' यही बात पिछले दिनों एक चीनी अखबार में दो विद्वानों चिंग कुआन ली और मार्क्स सेल्डन ने लिखी थी । इन दोनों ने लिखा था कि चीन ने पिछले तीन दशकों में जो प्रगति कि है उसमे चीनी युवाओं को सिर्फ़ यह प्रशिक्षण दिया गया है कि सफलता कि पूजा करो। इस सफलता से उनका मतलब सिर्फ़ धनी बनने से है क्योंकि उनकी नज़र में प्रसिद्धी पाने के लिए धनी बनना आवश्यक है। इसका मतलब तो यही हुआ कि धनी होते ही सारे दुर्गुण छुप जाते हैं यानि धन संपन्नता वह योग्यता है जो काले धब्बों की सर्जरी कर देती है। यही कारण है कि आज निश्चित - अनिश्चित स्रोतों से धन अर्जन कराने वाले अब समाज का आइना बन गए हैं। वह चाहे संसद में घूस लेने वाले संसद हों या घूस देकर प्रधान मंत्री की कुर्सी बचाने वाले हमारे राजनीतिक नायक या फ़िर बड़े अपराधी अथवा कारपोरेट क्रिमिनल्स। अब यही हमारे लम्बरदार /नम्बरदार हैं और सभी जन इन्हीं के चरणों की रज लेकर मोक्ष पाना चाहते हैं। १९७० के दशक में पूंजीव…