शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

जीरोसम अर्थमेटिकल डिवीडेंड

भारत में आजकल हर बात पर जश्न मनाने की परम्परा चल पड़ी है। हर बात ऐतिहासिक होती है और उस इतिहास को लिखने का कार्य प्रधानमंत्री के एकाउंट में चला जाता है। मंत्रिपरिषद, दलगत विमर्श, संसदीय डिस्कशन, आंतरिक संवाद और बड़ी-बड़ी डिबेट्स के बाद निष्कर्ष पर पहुंचने का युग अब समाप्त होता प्रतीत हो रहा है, जो लोकतंत्र की प्राणवायु थे। ऐसे में सबसे बड़ी दिक्कत इस बात की है कि हम और हमारा देश और हमारी संस्थाएं, तीनों ही समीक्षा और आत्मपरीक्षण की ताकत धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। हमारे यहां थिंक टैंक तो पहले से ही नहीं था, अब मंत्रिपषिद एवं अनुषंगी संगठन भी नेपथ्य में चले गये हैं और व्यक्ति या एक पद केन्द्र में ला दिया गया है। यह कुछ समय के लिए छद्म खुशी या छद्मवाद के लिहाज से बेहतर हो सकता है लेकिन दीर्घकाल में न तो देश के लिए बेहतर है, न देश के लोगों के लिए, न देश की संस्थाओं के लिए और न ही आंतरिक व बाह्य लोकतंत्र के लिए। इसलिए जरूरी है कि हम विषयों को गम्भीरता से पढें, जाने और सापेक्षिक विश्लेषण करें तत्पश्चात निष्कर्ष पर पहुंचे। अन्यथा 100 का अर्थमेटिकल डिवीडेंट जीरोसम होगा। विषय इससे अलग है लेकिन दृष्टिकोण के विकास के लिए हम चीन और भारत के डोकलाम से श्यामन तक के सफर को देखते की कोशिश करते हैं जहां अतिआत्मविश्वास एवं जश्न की परम्परा से कुछ भिन्न मुझे दिखयी दिया। डोकलाम को लेकर ट्राई-जंक्शन पर भारत-चीन की सेनाओं का लम्बे समय तक आमने-सामने रहना और फिर ब्रिक्स की श्मयान (चीन) समिट से ठीक पहले उन्हें वापस लौटाने पर बनी सहमति से इतना तो लगने लगा था कि चीन यह चाहता है कि ब्रिक्स सम्मेलन में भारत प्रत्येक स्थिति में भाग ले। इसलिए यह उम्मीद भी की जा रही थी कि चीन ब्रिक्स सम्मेलन में एक उदार मेजबान के आदर्श को प्रस्तुत अवश्य करेगा। हालांकि यह कहना मुश्किल है कि चीन के इस तरह से रुख में आए परिवर्तन का कारण उसके मनोविज्ञान में आया बदलाव था इसलिए संभावना यह बनती है कि यह उसकी रणनीति का हिस्सा है। अतः सावधान रहने की जरूरत है और साथ इस बात पर विचार करने की की कि श्यामन समिट में जिस तरह से चीन ने आतंकवाद को लेकर अपना दृष्टिकोण बदला वह क्या है? एक तरफ से देखें तो यह भारत के लिए कूटनीतिक सफलता है लेकिन दूसरी तरफ यह विचार करने का विषय कि आखिर कल तक पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों और उनके सरगनाओं के साथ मजबूती से खड़ा चीन आखिर एकाएक कैसे बदल गया। क्या चीन वास्तव में आतंकवाद के खिलाफ सार्थक लड़ाई लड़ना चाहता है या फिर कूटनीतिक की चौसर पर वह कोई नयी चाल चल रहा है? सवाल यह भी उठता है कि क्या चीन वास्तव में अपने ऑल व्हेदर फ्रेंड पाकिस्तान को नाराज कर सकता है ? क्या दक्षिण एशिया में अपने उद्देश्यों वह पाकिस्तान के सहयोग के बिना पूरा कर सकता है? विचार तो इस विषय पर भी करना चाहिए कि क्या निंदा सिर्फ औपचारिकता है अथवा चीन का आतंकवाद और पाकिस्तान के प्रति नजरिए में बदलाव का प्रतीक? श्यामन घोषणा पत्र में कहा गया है कि,’’हम ब्रिक्स देशों समेत पूरी दुनिया में हुए आतंकी हमलों की निंदा करते हैं। हम हर प्रकार के आतंकवाद की निंदा करते हैं, चाहे वो कहीं भी घटित हुआ हो। इनके पक्ष में कोई तर्क नहीं दिया जा सकता। हम इस क्षेत्र में तालिबान, आईएसआईएस, अल-कायदा और इनके सहियोगियों, जिसमें ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम), इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, हिज्ब-उत-तहरीर भी शामिल हैं, द्वारा की जा रही हिंसा की निंदा करते हैं और इस क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंतित है।’ सिद्धांततः निंदा का यह प्रस्ताव भारत के लिए आतंकवाद को लेकर लड़ी जा रही कूटनीतिक लड़ाई में एक कामयाबी है क्योंकि चीन जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर पर यूएन द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने की दिशा में रोड़े अटका चुका है। लेकिन इस निंदा सम्बंधी संयुक्त घोषणा के ठीक बाद चीन की तरफ से जो बयान आया, उसमें निहित संदेश क्या था, क्या हमने वास्तव में उसे समझने की कोशिश की। श्यामन घोषणापत्र के ठीक बाद चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता शुआंग ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि जैश-ए-मुहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क का नाम ब्रिक्स के ज्वॉइंट डिक्लरेशन में इसलिए आया क्योंकि ये संगठन इस इलाके में हिंसा फैलाते हैं। तो क्या चीन यह कहना चाह रहा है कि संगठनों की निंदा का सिरा संगठनों के प्रमुखों तक नहीं जाता। यानि मसूद अजहर या हाफिज सईद जैसे आतंकियों पर चीन की दृष्टिकोण अभी भी वही है, जो पहले था। यानि मसूद अजहर जैसे लोगों पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध के खिलाफ था और अब भी है भले ही वह उसके संगठन जैश को हिंसा फैलाने वाला बता रहा हो। शुआंग स्पष्ट किया कि आतंकवाद के खिलाफ ग्लोबल कैंपेन में हम हिस्सा ले रहे हैं लेकिन इस मामले में हमारी स्थिति पहले की ही तरह है। जहां तक चीन के बदले हुए नजरिए का सवाल है तो इसे तात्कालिक परिदृश्य की बजाय व्यापक परिदृश्य में समझने की जरूरत हैं अगर हम 15 मई 2017 या उससे कुछ पहले तक जाकर देखें, जहां चीन यह अपेक्षा व्यक्त कर रहा था कि भारत उसके ‘वन बेल्ट वन रोड’ प्रोजेक्ट में शामिल हो। लेकिन 15 मई को बेल्ट एण्ड रोड फोरम में भारत शामिल नहीं हुआ बल्कि उसने चीन के सामने आधिकारिक रूप से कुछ पक्ष रखे। इनमें एक पक्षा चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के जरिए चीन द्वारा भारत की सम्प्रभुता का अनादर और बेल्ट एण्ड रोड इनीशिएटिव द्वारा नव-साम्राज्यवादी व्यवस्था का विस्तार करने करना प्रमुख था। चीन के लिए यह असहनीय था और विचार का विषय भी कि जिसे दुनिया के 138 देशों ने स्वीकार किया अथवा चुनौती देने की कोशिश नहीं की, उसे भारत ने चुनौती देने का साहस कैसे कर लिया। यही वजह है कि चीन ने भारत को झुकाने के लिए डोकलाम का मुद्दा पैदा कर दिया। अहम बात यह रही कि डोकलाम पर भारत न तो झुका और न ही पीछे हटा। उलटे भारत में चीन का कमोडिटी निर्यात दबाव में आ गया। इसलिए चीन को पुनर्विचार करने का वक्त चाहिए था। इसलिए उसने शायद एक इण्टरवल लिया है, जिसमें चीन कुछ पीछे हटता हुआ नजर आ रहा लेकिन वास्तव में हटा नहीं है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि चीन को वन बेल्ट वन रोड जैसे अतिमहत्वाकांक्षी (अथवा साम्राज्यवादी) प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए भारत के सहयोग की जरूरत है। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो-एक तो उसे सीपीईसी और न्यू मैरीटाइम सिल्क रूट, जो ओबीओआर के घटक हैं, पर भारत के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। द्वितीय-यदि भारत निरन्तर विरोध की रणनीति पर काम करने लगा तो उसके इस प्रोजेक्ट को पूरा होने में काफी विलम्ब होगा जो आर्थिक दृष्टि से बेहद नुकसानदेह होगा। तृतीय- चीन जिस तरह से लगातार छोटे-छोटे देशों को कर्ज बांट रहा है उससे कुछ समय के लिए तो उसे नए विश्व बैंक के रूप में दुनिया प्रतिष्ठा मिली लेकिन वे देश गिरती विकास दर के कारण कर्ज वापस करने की स्थिति में नहीं हैं यानि वे ‘डेट ट्रैप’ में हैं और चीन भारी दबाव में। अब उसे ओबीओआर के लिए बड़े ऋणों की जरूरत है। ये ऋण एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) तथा ब्रिक्स बैंक मुहैया करा सकते हैं जहां भारत निर्णायक हैसियत में है। तीसरा पक्ष चीनी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार सम्बंधी भी है जहां पिछले दिनों कुछ गिरावट देखी गयी है। स्वाभाविक है कि भारत को अपने पक्ष में करने के लिए चीन को झुकने की जरूरत थी। तात्पर्य यह कि चीन झुका नहीं है बल्कि निहित उद्देश्यों की खातिर थोड़ा पीछे हटा है। सम्भवतः चीन का मनोविज्ञान पढ़ लेने के बाद ही भारतीय सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने गुरुवार को युद्ध संबंधी बयान दिया। जनरल बिपिन रावत ने बुधवार को कहा था कि भारत चीन और पाकिस्तान के साथ दो मोर्चों पर युद्ध (टू फ्रंट वार) से इन्कार नहीं कर सकता। जनरल रावत ने यह भी कहा है कि, ’जहां तक हमारे उत्तरी विरोधी का सवाल है तो ताकत दिखाने का दौर शुरू हो चुका है। धीरे-धीरे भू-भाग पर कब्जा करना और हमारी सहने की क्षमता को परखना हमारे लिए चिंता का सबब है। इस प्रकार की परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए जो धीरे-धीरे संघर्ष के रूप में बदल सकती है।’ बहरहाल इन स्थितियों को देखते हुए हमें निंदा प्रस्ताव पर अतिआत्मविश्वासी होन की जरूरत नहीं है। वैसे भी निंदा प्रतिबंध की श्रेणी में नहीं आती इसलिए इससे न ही पाकिस्तान पर शिंकजा कसना है और आतकी संगठनों पर कोई खरोंच आनी है। यानि हमें कोई अर्थमेटिकल डिवीडेंड प्राप्त होने वाला नहीं है।

रविवार, 3 सितंबर 2017

ओ यंग वर्ल्ड!

पैदाइशी किस्मत बदल चुकी है-जिस तरह भूगोल और प्रतिभा का पूरा सम्बंध बदल चुका है। तीस साल पहले अगर आपके पास विकल्प होता कि आप बॉम्बे या शंघाई के किसी उपनगरीय क्षेत्र में एक जीनियस के रूप में पैदा होते या फिर अमेरिका में एक औसत आदमी के रूप में, तो आपके फलने-फूलने और अच्छी जिंदगी बिताने की उम्मीद अमेरिका में ज्यादा थी। लेकिन दुनिया के समतल होने क साथ बड़ी संख्या में लोग कम्प्यूटर और इंटरनेट का प्रयोग कर सकते हैं। प्राकृतिक प्रतिभा भूगोल पर भारी पड़ने लगी है। यह सच है कि लेकिन क्या वास्तव में बिल गेट्स अमेरिका के उच्च कोटि के शहरों की बजाय शंघाई या मुंबई जैसे शहरों में रहना पसंद करेंगे? या फिर वे इन शहरों को अपने बिजनेस मॉडल के लिहाज से श्रेष्ठ बताने का प्रयास कर रहे हैं? यह हमें और आपको तय करना है। कारण यह है कि हम ऐसे वक्तव्यों की छानबीन किए बिना ही ऐसे वक्तव्यों को आत्ममुग्धता का आधार बना लेते हैं और विकास व जीवतंतापूर्ण शैली के सभी प्रतिमान इस तरह से हमारे पाले में आ जाते हैं। दरअसल इस तरह का निष्कर्ष भी आभासी दुनिया की तरह होते हैं जो क्लिक एण्ड ब्राउजिंग के साथ प्रकट होते चलते हैं। देखना है कि हम बिल गेट्स की बात से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्मार्ट सिटी के विचार (जो अभी तक विचार ही है अवसंरचना में तब्दील नहीं हुआ है) को किस तरह से जोड़कर देखते हैं और बिना निर्माण के ही निर्माण का सुख किस तरह से भोगते हैं ? या फिर आंखें खोलने की जहमत उठाने की यत्न करते हैं? बर्लिन वॉल के गिरने के बाद दुनिया जिस तरह से बदली और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी ने जिस तरह से मनुष्य के हाथों में खेलना शुरू किया वास्तव में उसने इतिहास को तो नहीं बदला लेकिन भूगोल बहुत छोटा कर दिया। 1990 के वैश्विक भूगोल के मुकाबले वर्ष 2017 का भूगोल काफी बदला हुआ है। हालांकि यह सिंक्रोनाइज होने के बाद पुनः धुंधली रेखाओं के साथ बंटने लगा है। पता नहीं हम सभी उसे सही देख पा रहे हैं या नहीं। अगर सही देखें तो दिखेगा कि ‘विश्व ग्राम’ अब पुनः कुछ मुहल्लों में बंट रहा है। इसकी शुरूआत कहीं से हुयी हो-चाहे यूरोप से, अमेरिका से, एशिया से या फिर हिन्दुस्तान से ही क्यों नहीं, लेकिन शुरूआत तो हो चुकी है। इस शुरूआत में ‘वी’ को ‘आई’ ने डिस्प्लेस कर कर दिया है। अब ‘वी द यंग वर्ल्ड’ ‘वी द पीसफुल वर्ल्ड’ हैं, इसमें संशय है क्योंकि अब फर्स्ट का छद्म इस पर हावी होता जा रहा है। अब डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट का महासागर ‘मज्म-उल-बहरैन’ के मोतियों को ब्राउजिंग का विषय नहीं बना रहा है बल्कि अनल-हक़ के नए अवतरों के जरिए नए उन्मादों की बुनियाद को खोज रहा है। ऐसे में यह संशय लगातार बना रहता है कि नए विश्व के नए दायरे किस चीज का निर्माण करने वाले हैं? बहरहाल माना जा रहा है कि आज का युग ‘नॉलेज मेरिटोक्रेसी’ का जमाना है। लेकिन नॉलेज फॉर व्हाट ? मैं तो यही कहूंगा कि ‘ओ यंग वर्ल्ड! दिस इज नॉट योर रियल पिक्चर।’ तो यह बिगाड़ी किसने ? इस विषय पर विचार कीजिएगा? कौन दोषी है?

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

नोटबंदी : सनक या रणनीति

इलियट का एक कथन है -‘‘सभी तरह की भूलों में, भविष्यवाणी करना सबसे ज्यादा गैर-जरूरी है।’’ शायद यही वजह है कि दायित्वों से बंधे लोग भविष्यवाणी करने से बचते रहते हैं। भारत में वैसे भी ऋषियों-मुनियों या देवताओं की तरफ से ही भविष्यवाणी की गयी नेतृत्व की तरफ से नहीं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बात को नहीं समझ सके इसलिए उन्होंने एक नहीं बल्कि कई भविष्यवाणियां कीं जिनके परिणामों पर सरकार स्वयं ही टिक कर तथ्यात्मक जवाब दे पाने असमर्थ दिख रही है। इन भविष्यवाणियों में कुछ 8 नवम्बर 2016 के उस निर्णय से भी जुड़ी हैं, जिसे विमुद्रीकरण (डिमॉनीटाइजेशन) नाम दिया गया था। प्रधानमंत्री का यह निर्णय और इससे जुड़ी भविष्यवाणियां ऐसी थीं, जिसके कारण देश बहुत तकलीफ से गुजरा। लोगों ने शृद्धापूरक या विवशतावश इसे इस उम्मीद से सहा कि जल्द ही कोई बहुत बड़ा लाभ उन्हें और देश को होने वाला है। लेकिन अब स्थिति साफ हो चुकी है कि वे घोषणाएं आधारहीन थीं और वह निर्णय गलत। 8 नवम्बर 2017 को जब प्रधानमंत्री ने 500 और 1000 के नोटों को गैर-काननी मुद्रा घोषित करते हुए घोषणा की थी कि मध्यरात्रि से ये नोट कागज के टुकड़े रह जाएंगे तब उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि इससे भ्रष्टाचार, जाली मुद्रा, टेरर फंडिग, काला धन समाप्त हो जाएगा। सिर्फ 15 दिन बाद प्रधानमंत्री ने मन बात में भविष्यवाणी से इतर एक और भविष्यवाणी की जिसमें देश को कैशलेश इकोनॉमी में बदलने फरमा था। फिर गोवा में प्रधानमंत्री ने जनता से बेहद भावुक होकर 50 दिन मांगे और बताए हुए परिणाम न आने पर किसी भी चौराहे पर दण्डित करने की बात कही। इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने नित नए नियम पारित कर अपनी साख को ताख पर रख दिया (शायद रिजर्व बैंक के सम्पूर्ण इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था)। रिजर्व बैंक ने अपनी साख पर बट्टा लगाने वाले इससे भी बड़े-बड़े कुछ और कारनामे भी किए। उसने 28 नवम्बर को ही अपने प्रॉविजनल असेसमेंट में बताया कि 8 लाख 48 हजार करोड़ के पुराने नोट वापस आ चुके हैं फिर 14 दिसम्बर को बताया कि 12 लाख 44 हजार करोड़ नोट वापस आ गये जो कुल नोटों के लगभग 80 प्रतिशत थे। लेकिन इसके बाद 20 प्रतिशत नोटों को गिनने में उसे 8 महीने लग गये। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने संसदीय समिति से जून 2017 में कहा कि नोट गिनने वाली मशीनों के अभाव में अभी गिनती नहीं हो पा रही है। क्या रिजर्व बैंक के अधीन काम करने वाले बैंक अक्षम एवं निकम्मे हैं जिस कारण से रिजर्व बैंक को बैंकों पर भरोसा नहीं था इसलिए गिनती करनी पड़ी या फिर बैंकों ने बिना गिने ही ग्राहकों से नोट ले लिए थे और रिजर्व बैंक को भेज दिए थे ? सामान्य विवेकी व्यक्ति भी यह कह सकता है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर झूठ बोल रहे थे। लेकिन क्यों? और किसके लिए? स्वाभाविक है कि अपने या बैंक के लिए नहीं। प्रधानमंत्री द्वारा की गयी विमुद्रीकरण की घोषणा के कुछ समय बाद ’फोर्ब्स’ के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ स्टीव फोर्ब्स ने अपने संपादकीय में लिखा था कि ग्रह के आबाद होने के वक्त से ही इंसानी फितरत नहीं बदली है। गलत काम करने वाले कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं। आतंकवादी सिर्फ करेंसी बदल देने की वजह से अपनी बुरी हरकतें बंद नहीं कर देंगे, और धन का डिजिटलाइज़ेशन होने में काफी वक्त लगने वाला है, वह भी जब फ्री मार्केट की अनुमति दे दी गयी हो। अभी कर विभाग और भी अधिक हस्तक्षेप करने वाला है जो न ही इस देश के लोगों की स्वतंत्र जीवन शैली के लिए और न भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा होगा। यह बात उस नीति आयोग के अध्यक्ष पनगढ़िया ने भी स्वीकार की थी, जो अब इस्तीफा देकर घर वापसी कर चुके हैं। स्टीव फोर्ब्स ने यह भी कहा था कि भारत इस समय नकदी के खिलाफ सरकारों के दिमाग में चढ़ी सनक का सबसे चरम उदाहरण है। वास्तव में सच यही था जिसमें सनक वास्तविकता पर काफी भारी पड़ी। अब परिणाम सामने आ रहे हैं। ये अंतिम नहीं हैं बल्कि इन्हें आप पहली या दूसरी किस्त के रूप में मान सकते हैं। ध्यान रहे कि अप्रैल से जून के बीच भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) खासी गिरावट आयी है। पहले इसके 6.6 प्रतिशत का अनुमान था लेकिन अब 5.7 प्रतिशत ही दर्ज की गयी। एक वर्ष पहले की पहली तिमाही में जीडीपी 7.9 प्रतिशत की दर से बढ़ी थी। यानि एक वर्ष के अंदर जीडीपी में 2.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी। यदि आर्थिक लिहाज से देखें तो अर्थशास्त्रियों के अनुमान के मुताबिक भारत की जीडीपी में 1 प्रतिशत की गिरावट आने का मतलब होता है अर्थव्यवस्था में 1.5 लाख करोड़ रुपये की कमी आ जाना। चूंकि विमुद्रीकरण से पहले वाली स्थिति से वर्तमान स्थिति में 2.2 प्रतिशत की गिरावट आयी है जिसका तात्पर्य हुआ लगभग 3.3 लाख करोड़ रुपयों की कमी का आ जाना। इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि निवेश और उत्पादन की सकल मांग में कमी आयी होगी जिसका असर उत्पादन व विनिर्माण के विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ा (जिसे आर्थिक समीक्षा के दूसरे भाग सहित तमाम रिपोर्टों में देखा जा सकता है)। विमुद्रीकरण अथवा नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर माइक्रो, लघु एवं मझौली कम्पनियों पर पड़ा। एक आकलन के अनुसार लगभग 2.5 लाख माइक्रो, लघु और मझौली कम्पनियां इसका शिकार हुयीं। यदि प्रति कम्पनी औसतन 50 मजदूर भी मान लिए जाएं तो भी लगभग सवा करोड़ लोग जीविका से वंचित हो गये। असंगठित एवं अनौपचारिक क्षेत्र लगभग टूट गया। इसने ग्रामीण एवं स्थानीय कस्बाई अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। उस समय जब कृषक को बीज व खाद की जरूरत होती है और वे अपने अनाज को बेचकर ही इसे खरीदते हैं। चलन की मुद्रा के अभाव के कारण वे अनाज नहीं बेच पाए और उन्हें कर्ज के बोझ तले दबना पड़ा जिसकी भरपाई सरकारों को कृषकों के आधे-अधूरे कर्ज माफ करके करनी पड़ रही है। ध्यान रहे कि जून तिमाही में कृषि में 2.3 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई जो पिछले वर्ष समान तिमाही में 5.2 प्रतिशत थी। यही नहीं नोटबंदी के कारण रिजर्व बैंक की कमाई से सरकार को मिलने वाला लाभांश भी कम हो गया। उल्लेखनीय है कि 2015-16 में भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत सरकार को 65.875 करोड़ रुपये लाभांश के रूप में दिए थे जो 2016-17 में घटकर 30,695 करोड़ रुपये ही रह गये। कारण यह रहा कि बैंकों के पास जो अतिरिक्त कैश मनी आयी, वह सही अर्थों में मांग जमा के रूप थी। जिससे बैंक दीर्घकालिक साख का निर्माण नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने इसे भारतीय रिजर्व बैंक के पास जमा कर दिया। रिजर्व बैंक को इस पर ब्याज देना पड़ा। रही बात कितना काला धन वापस आया या फिर चलन से बाहर होकर निष्प्रयोज्य हो गया अथवा कितने टैक्स पेयर्स बढ़ गये। इस संदर्भ में रिजर्व बैंक, प्रधानमंत्री और आर्थिक सर्वे द्वारा दिए गये आंकड़ों में भारी अंतर है। आर्थिक सर्वे सर्वाधिक विश्वसनीय माना जाएगा क्योंकि इसका आधार दस्तावेजी है तो इसके अनुसार सिर्फ 5.4 लाख रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या बढ़ी है। रही बात काले धन की तो जो भी धन बैंकिंग तंत्र में वापस आ गया है और खाता धारकों के खातों में अंकित हो चुका है, वह तकनीकी तौर पर काला धन नहीं हो सकता। सरकार जो भी चाहे इस विषय पर तर्क या तर्केत्तर परिभाषाएं दे। वर्ष 2016-17 में निवेश में वृद्धि की काफी उम्मीदें की जा रहीं थीं लेकिन नोटबंदी ने इसे भी झटका दिया है। वास्तविकता यह है कि निवेश अब भी नोटबंदी के पहले के स्तर पर नहीं पहुंच पाया है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जून के दौरान सकल मूल्य वर्द्धन (जीवीए) में 5.6 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई जो 2016-17 की चौथी तिमाही के समान ही है। नोटबंदी के साथ ही जून तिमाही में जीएसटी से पहले कंपनियों द्वारा अपने स्टॉक खाली करने का भी असर पड़ा है। विनिर्माण क्षेत्र को देखें तो यह असर साफ नजर आता है। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर वित्त वर्ष 2017 की चौथी तिमाही के 5.3 प्रतिशत से घटकर अप्रैल-जून 2017-18 के दौरान 1.2 प्रतिशत रह गई। सकल स्थिर पूंजी सृजन, जिससे मांग का संकेत मिलता है, में 1.6 प्रतिशत की वृद्धि हुयी है पिछली तिमाही में इसमें 2.1 प्रतिशत की गिरावट आई थी। आरबीआई ने 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा था कि नोटबंदी के बाद बैंकों की उधारी दर में कमी से दबाव-मुक्त कंपनियों की ओर से निवेश मांग बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसके बावजूद निवेश की वृद्धि दर 2016-17 की दूसरी तिमाही में 3 प्रतिशत और पहली तिमाही के 7.4 प्रतिशत के स्तर पर नहीं लौटी हैं। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री ने जब भारत में ‘हेलिकॉप्टर ड्रॉप’ की जरूरत थी ‘रिवर्स हेलिकॉप्टर ड्रॉप’ अथवा ‘हेलिकॉप्टर हूबर’ का प्रयोग किया। प्रधानमंत्री ने ‘गंदे नोटों’ (जिनकी दर 33 प्रतिशत प्रति वर्ष है) की बजाय पहले ‘उजले नोटों’ यानि 500 और 1000 (जिनके लिए गंदे नोटों की दर क्रमश : 22 और 11 प्रतिशत थी) के नोटों को कागज का टुकड़ा बना दिया। दरअसल उन्हें यह मालूम था कि जो नोट गंदे नहीं हुए हैं वे दबे-छिपे हुए रखे हैं जिनकी मात्रा 7.3 लाख करोड़ के आसपास है। लेकिन प्रधानमंत्री का अनुमान गलत निकला। दूसरा यह पक्ष भी समझ से परे निकला कि 1000 का नोट जो केवल 11 प्रतिशत गंदा हुआ, वह संव्यवहार में नही था तो बेशक कालेधन के भंडारण के लिए प्रयुक्त हो रहा था। इसलिए बड़ा नोट चलन से बाहर करने पर काले धन के भंडारण में कमी आएगी लेकिन 2000 का नोट जारी कर सरकार ने अपने ही सिद्धांत को उलट दिया। यही वजह है कि आज अधिकांश अर्थशास्त्री यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि नोटबंदी के पीछे प्रधानमंत्री की मंशा क्या थी और सरकार बता पाने में।