रविवार, 12 फ़रवरी 2012

कट्टरपंथ का दबदबा


डॉ. रहीस सिंह

मालदीव के उदार और लोकतांत्रिक रूप से चुने गए पहले राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद ने कई हफ्तों के राजनीतिक उथल.पुथल के बाद विद्रोहियों के साथ पुलिस के मिल जाने पर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र देते समय उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए जो बातें कहीए वे उनके उदात्त स्वभाव और लोकभावनाओं से उनके जुड़ाव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। उन्होंने कहा .ष्सड़कों पर हो रहे प्रदर्शन को कुचलने के लिए बल प्रयोग कर वह सत्ता में बने रहना नहीं चाहते। मैंने इसलिए पद से त्यागपत्र दियाए क्योंकि मैं उनमें से नहीं हूंए जो सत्ता का इस्तेमाल कर शासन में बने रहना चाहते हैं। मुझे लगता है कि यदि मैं सत्ता में बना रहता तो बल प्रयोग करना पड़ताए जिससे नागरिकों को नुकसान होता। यह भी संभव है कि हमें विदेशी प्रभाव का सामना करना पड़ता। मैंने हमेशा देश के लोगों का अच्छा चाहा हैए अब भी चाहता हूं और आगे भी चाहता रहूंगा।ष्
मोहम्मद नाशीद का लोकाधिकारों के लिए एक लंबा संघर्ष शायद उनके इस उदात्त निर्णय में सहायक हुआए जिसके जरिए वे दुनिया के तमाम तानाशाहों को भी एक संदेश दे गए। दरअसलए मोहम्मद नाशीद ने वर्ष 2008 मालदीव हुए पहले बहुदलीय चुनाव में तीन दशक से शासन कर रहे मौमेन अब्दुल गयूम को पराजित किया था। नाशीद लोकतंत्र समर्थक राजनीतिक कैदी रहे हैं और पर्यावरणविद् भी हैं। वर्ष 2008 में हुए चुनाव मालदीव में लोकशाही के पहले प्रयोग के रूप में देखे जा सकते हैं। इस पूर्णतरू इस्लामी देश में अन्य सभी आस्थाएं कानूनन वर्जित हैं। यहां सिर्फ सुन्नी मुसलमान ही नागरिक तथा मतदाता हो सकते हैं। इस राष्ट्र का शासकीय केन्द्र मस्जिद.ए.सुल्तान मुहम्मद है। इस लिहाज से वर्ष 2008 में मालदीव के राष्ट्रपति पद पर मोहम्मद नाशीद की विजय सूफीवादी उदार इस्लाम की फतह थी। खास बात यह है कि कट्टरपंथी तानाशाह अब्दुल गयूम ने उनके इसी उदात्त पक्ष को पिछले चुनाव मे पश्चिमी षड्यंत्र के रूप में भी पेश किया था। गयूम ने प्रचार किया था कि पश्चिमी देश उन्हें अपदस्थ कर मालदीव में ईसाईयत थोपना चाहते हैं।
हालांकि उस समय गयूम का हथकंडा असफल रहाए लेकिन कुछ दिन बाद ही मुस्लिम आतंकवादी वहां प्रकट होने लगे और अब्दुल गयूम अपनी नीतियों में कामयाब होते दिखे। मोहम्मद नाशीद ने राष्ट्रपति बनने के बाद कई प्रकार से मालदीव के संकट के बारे में दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। वर्ष 2009 में समुद्र के नीचे कैबिनेट की एक बैठक कर उन्होंने बिगड़ते पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता से दुनिया को अवगत कराने की कोशिश की। उन्होंने देश में उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करने के प्रयास किएए जो न केवल मालदीव की जनता के लिए बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए भी एक राहत भरा कदम माना जा सकता है। उन्होंने सार्क सम्मेलन में दक्षिण एशिया के देशों के समक्ष यह प्रतिबद्धता भी दिखायी थी कि मालदीव लोकतांत्रिक राह पर अग्रसर होकर विकास के मार्ग पर चलेगा। मोहम्मद नाशीद की लोकतंत्र के प्रति यह दृढ़ता उनके उस संघर्ष की देन हैए जो उन्होंने गयूम के तानाशाही के विरूद्ध लगभग पन्द्रह वर्ष तक किया।
मोहम्मद नाशीद के त्यागपत्र को एक सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। यह सही अर्थो में मालदीव में उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कट्टरपंथी ताकतों की विजय है। मालदीव के लोग चाहते हैं कि उनके देश का राष्ट्रपति ऎसा होए जो इस्लामी कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन करे और मोहम्मद नाशीद उनकी इस मंशा पर खरे नहीं उतर पा रहे थे। इस संपूर्ण प्रक्रिया के पीछे पाकिस्तान की अहम भूमिका रही। पाकिस्तान चाहता है कि मालदीव कट्टरपंथ का गढ़ बनेए ताकि वह अपनी भारत विरोधी गतिविधियों को मालदीव के जरिए अंजाम देने में कामयाब हो सके। गौरतलब है कि मालदीव के अधिकांश युवा उच्च शिक्षा के लिए पाकिस्तान का रूख करते हैं और वहां जाकर वे शिक्षा के साथ.साथ कट्टरपंथी इस्लामवाद विशेषताओं से संपन्न होकर वापस लौटते हैं। ये युवा पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित कट्टरपंथ की असल ताकत होते हैं। इन्हीं युवाओं के जरिए पाकिस्तान मालदीव की आंतरिक राजनीति पर नियंत्रण बनाए रखने का प्रयास करता है। इस विशिष्टता को देखते हुए ही शायद उसने 1988 में मालदीव का तख्तापलट करने की कोशिश भी की थीए जिसे भारत ने नाकाम कर दिया था।
गौर करें तो वर्तमान घटना भी पाकिस्तान की ही देन नजर आएगी। उल्लेखनीय है कि बीते नवंबर में दक्षेस शिखर सम्मेलन के दौरान दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सभी सदस्य देशों द्वारा अडू में कुछ स्मारक स्मृति चिन्ह के तौर पर बनाए गए थे। इस शहर के हिथाधू क्षेत्र में बने गए इन स्मृति चिन्हों में कुछ बौद्ध धर्म प्रतीक शामिल थे।कट्टरपंथियों ने इन्हें निशाना बनाया और इन्हें नष्ट कर दियाए लेकिन बात यहीं नहीं थमी। मालदीव सरकार द्वारा इस घटना पर खेद प्रकट करने के बाद स्थितियां और भी जटिल हो गई। खास बात यह रही कि विपक्षी पार्टियों विशेषकर अब्दुल गयूम की प्रोगे्रसिव पार्टी ऑफ मालदीव ने स्मारकों के ध्वंसकर्ताओं को राष्ट्रीय हीरो घोषित करते हुए सरकार के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया। इसकी अंतिम परिणति राष्ट्रपति के इस्तीफे के रूप में हुई। मालदीव में सत्ता परिवर्तन को राजनय भले ही साधारण घटना के रूप में देखेए लेकिन वास्तव में यह मालदीव में कट्टरपंथ की विजय है। चूंकि मालदीव हिंद महासागर में रणनीतिक लिहाज से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैए इसलिए वहां पर उन ताकतों की विजय भारत के लिए बेहद चिंजाजनक होनी चाहिएए जिनका नजरिया भारत विरोधी और पाक समर्थक होता है।
(लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं)

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