सोमवार, 15 अगस्त 2011

लेकतंत्र को जिंदा रहने दो

जब हमारे देश के प्रधानमंत्री शाहजहाँनाबाद यानी लाल किले की प्राचीर से किसी तरह से पढ़-पढ़कर लोगों को अपनी बात बता रहे थे, तो बार-बार मन स्वयं से यह प्रश्न कर रहा था कि क्या यही है नेहरू और गांधी जी की विरासत ? उनकी वाणी की शक्ति उनका साथ देने में असमर्थ दिख रही थे, उनके चेहरे पर स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ का खुशी कम बल्कि चिंता के बल अधिक थे.....वह चिंता जिसके जिम्मेदार एक संवैधानिक व्यवस्था के प्रमुख होने के नाते बहुत हद तक वे स्वयं हैं। इस दृष्टि से देखें तो भ्रम की स्थिति बनती है कि हम इन 64वर्षों में कुछ शक्ति बटोर ताकतवर बने या फिर इतने निर्बल कि हमारा नेतृत्व सीधे अपने पैरों पर खड़ा होने में असमर्थ साबित हो रहा है। आज नेतृत्व अपने देश के लोगों को असंवैधानिक भाषा में और असंवैधानिक व अमर्यादित आचरण द्वारा लगातार सीख देने प्रहसन बार-बार दोहरा रहा है। अनशन करना, जनमत लेने की बात करना सरकार और उसके मीडियाई चेहरों को असंवैधानिक लगता है। उसके कुछ चारणी नुमाइंदे अन्ना जैसे कुछ भारतीयों से यह पूछने लगे कि वे हैं कौन ? यह सवाल तो साम्राज्यवादियों ने गांधी जी से भी नहीं पूछा था और न ही गांधी जी आंचरण पर ऐसे आरोप गढ़ने की लज्जास्पद गलती की थी ? अगर वे यही करते तो गांधी को तो हिन्दुस्तान में कोई जगह ही नहीं मिलती। वे कर सकते थे क्योंकि उनसे हमारा ऐसा सरोकार नहीं था जैसा हमारी आज की सरकार से है, फिर नहीं किया। फिर आज की सरकार को क्या हो गया, कि अपने ही लोगों से इस तरह पेश आने लगी कि शब्द और चेहरे उसका साथ नहीं दे पा रहे हैं। ......आज कांग्रेस उसी गांधी के नाम का बहुत कुछ खा रही है लेकिन उनका लिखा हुआ एक अध्याय पढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रही ? ऐसे लोगों से सिर्फ यही अनुरोध किया जा सकता है कि गांधी और नेहरू जी लिखे कुछ अक्षरों से भेंट कर लो और हमारे लोकतंत्र को जिंदा रहने दो...इसे सीरिया जैसी स्थिति में लाने का गुनाह न करो......जय हिंद!

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