मंगलवार, 15 नवंबर 2011

सीरिया का काउंट डाउन

opinion
सीरिया में सत्ताधारियों और सुधारवादियों के बीच संघर्ष जिस हिंसात्मक दौर में पहुंच गया है, और जिस तरह से वैश्विक दबाव एक आकार लेता दिखाई दे रहा है, उससे तो यही लगता है कि राष्ट्रपति बशर अल असद की भी उलटी गिनती शुरू हो गई है। सीरियाई राष्ट्रपति इसके उलट यह धमकी देते दिख रहे हैं कि उनके देश में किसी भी प्रकार की पश्चिमी सैन्य कार्रवाई भूकंप ला सकती है। इसे क्या माना जाए, उनका आत्मविश्वास या फिर अतिवादिता अथवा नासमझी?
सीरियाई राष्ट्रपति ने द संडे टेलीग्राफ को दिए साक्षात्कार में यह स्वीकार किया कि पश्चिमी सेनाओं का हम पर दवाब बढ़ रहा है, लेकिन किसी भी हस्तक्षेप से सीरिया एक और अफगानिस्तान में बदल सकता है। उनका कहना था कि इस क्षेत्र में सीरिया मुख्य केंद्र है, इसलिए यदि सीरिया में कोई समस्या होती है तो इसका असर पूरे इलाके पर पड़ेगा। उनका कहना था कि मिस्त्र और ट्यूनीशिया से सीरिया की स्थिति भिन्न है, इसकी राजनीति और इतिहास बिलकुल भिन्न हैं।

उनका यह बयान तब आया, जब सरकार विरोधी सीरियाइयों ने लीबिया की तरह सीरिया को नो फ्लाई जोन घोषित करने की मांग की और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सीरिया में दमन समाप्त करने की बात दोहराई। सीरिया के मुख्य विपक्षी गुट ने आपातकालीन अपील जारी करके अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से हिंसा रूकवाने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है। असद अब भी गलतियां नहीं मान रहे हैं, क्योंकि उनका कहना है कि अब केवल आतंकवादियों को ही निशाना बनाया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि कि क्या राष्ट्रपति बशर अल असद द्वारा प्रयुक्त की जा रही आक्रामक शब्दावली के लिए यह उचित समय है? आंदोलन दिन-ब-दिन शक्ति पकड़ता जा रहा है और राष्ट्रपति बशर-अल-असद जनता की भावना के अनुरूप खरे नहीं उतर पा रहे हैं। लोकतंत्र की बहाली की मांग से इतर वे इस आंदोलन को घोर अलोकतांत्रिक तरीके से कुचलने की चेष्टा में लगे हुए हैं। मार्च के मध्य से अब तक दसियों हजार लोग बेघर हो चुके हैं और लगभग 3 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र और तमाम लोकतांत्रिक देशों द्वारा सीरियाई सरकार की गई निंदा का सरकार पर कोई असर नहीं हुआ। राष्ट्रपति बशर अभी भी यही कह रहे हैं कि सीरियाई सरकार सुधार की राह पर है, लेकिन ये सरकार का फर्ज है कि वो अपराधियों का सामना करे। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार की नजर में लोकतंत्र की आवाज उठाने वाले अपराधी हैं।
सीरियाई राष्ट्रपति के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें रूस भी चेतावनी दे चुका है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने सीरियाई राष्ट्रपति असद से सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने या फिर पद से हटने के लिए स्पष्ट शब्दों में कहा था। हालांकि मेदवेदेव ने समय और पश्चिमी शक्तियों की मंशा को देखते हुए बड़ी सावधानी के साथ संयमित शब्दों में दबाव वाली भाषा का प्रयोग किया था। वे कहने से नहीं चूके कि शासन के भाग्य का निर्णय सीरियाई और वे लोग कर सकते हैं, जो सीरिया का राजनीतिक नेतृत्व कर रहे हैं, नाटो के कुछ सदस्य देशों या कुछ यूरोपीय देशों को इस तरह का निर्णय करने का अधिकार नहीं है।

दरअसल, पश्चिमी देश सीरिया पर यह आरोप लगा रहे हैं कि वहां कूटनीतिक शिष्टाचार का पालन नहीं हो रहा है और इसके प्रमाण भी देखने को मिले। रूस ही नहीं, पूरी दुनिया इस बात से वाकिफ है कि इन कारणों के बावजूद अमेरिका और यूरोपीय देशों की मंशा की पवित्रता पर यकीन नहीं किया जा सकता। अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान में लोकतंत्र का खूब तमाशा किया, उसके समर्थन से नाटो सेना अपना दायरा बढ़ाती गई और लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर छा लोकतंत्र या सैन्य नियंत्रित लोकतंत्र स्थापित करती गई। यही कारण है कि वहां की जनता अभी तक पश्चिम द्वारा स्थापित शांति व्यवस्था और लोकतंत्र से न तो संतुष्ट है और न ही उसमें सुरक्षित महसूस कर रही है। इसके बावजूद सीरिया की जनता पश्चिम से असद के खिलाफ सहायता की मांग कर रही है और उसे उम्मीद है कि पश्चिम की तरफ से कोई न कोई मदद अवश्य मिलेगी।
गद्दाफी की मौत के बाद विद्रोहियों या सुधारवादियों में गजब का आत्मविश्वास दिखने लगा है। हालांकि सरकार अपने आपको बचाने के लिए आंदोलन को कुचलने के लगभग सभी तरीके अपना रही है, लेकिन सच यह है कि सरकार की इस तरह की कार्य-प्रणाली विद्रोहियों को सरकार गिराने के लिए और उकसाने का कार्य कर रही है। इसी कार्रवाई का परिणाम है कि सरकार विरोधी आंदोलन अब प्रमुख नगरों से लेकर देश के अधिकांश भागों में अपनी पैठ बना चुका है। यही नहीं, अब सुरक्षा बलों के भीतर भी एक प्रवृत्ति दिख रही है, जो सरकार के लिए घातक हो सकती है। इनमें दलबदल और विरोधी इकाइयों मे शामिल होने या फिर उनका साथ देने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है, जो वहां की स्थितियों को और भी हिंसक बनाने का कार्य कर सकती है। ऎसे में एक-एक कर अरब देशों तथा उसके सहयोगियों का सीरियाई शासन के समर्थन से किनारा करना कुछ और संकेत देता है।
सीरिया ने अरब लीग के उस शांति समझौते को स्वीकार कर लिया था, जिसके तहत हिंसा रोकने और रिहाइशी इलाकों से सैनिकों को हटाया जाना था मगर ऎसा नहीं हुआ है। बल्कि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद ने आंदोलनरत नागरिकों के लिए फरमान जारी किया है कि अगर वे एक सप्ताह से भीतर अपने हथियार सौंप देते हैं तो उन्हें माफ कर दिया जाएगा, लेकिन अमेरिका ने एक बयान जारी करके कहा है कि सीरियाई नागरिकों के लिए मौजूदा सरकार के सामने आत्मसमर्पण करना खतरनाक हो सकता है। अब रूस और चीन सहित तमाम खाड़ी देश भी सीरिया में जारी तबाही पर मौन समर्थन देने के दोष से मुक्त होने की मंशा व्यक्त कर चुके हैं और पश्चिमी शक्तियां पूरी तरह से उसके खिलाफ हैं। ऎसे में राष्ट्रपति असद के लिए बेहतर यही होगा कि आक्रामक व्यवहार को छोड़कर जनता की इच्छानुसार कार्य करने पर विचार करे, अन्यथा खूनी संघर्ष का लीबिया का इतिहास सीरिया में दोहराया जा सकता है।

सोमवार, 5 सितंबर 2011

मनावैज्ञानिक धरातल बदलने की जरूरत

अध्यात्मिक चिंतन, कर्म एवं प्रेममय जीवन, सभ्यताओं का समन्वय और सम्पूर्णत्रुटियों से मनुष्य की अवस्था के निर्माण की बात जैसे ही मस्तिष्क में आती है, डा. राधाकृष्णन वैसे ही पूरे मनोवैज्ञानिक धरातल पर सहज ही उतर आते हैं। डा. राधाकृष्णन का पूरा चिंतन उनकी जिन रचनाओं में प्राणवायु बनकर प्रवाहित हो रहा है वे हैं- इंडियन फिलासोफी, दि व्यू आॅफ लाइफ, ईस्टर्न रिलीजन एवं वेस्टर्न थाट, एन आइडियलिस्ट व्यू आॅफ लाइफ, एजूकेशन पालिटिक्स एंड वार , दि कान्सेप्ट आॅफ मैन, माई सर्च फाॅर ट्रुथ आदि।
शैक्षिक संक्रियाओं और शैक्षिक रचनाधर्मिता चिंतन से उद्भूत होती है सो डा. कृष्णन के दार्शनिक पक्ष से अंशतः ही सही पर परिचित हुए बगैर उनके शिक्षक के व्यक्तित्व को समझ पाना मुश्किल होगा। वे मनुष्य को न केवल परफेक्ट मैन या कम्पलीट मैन की ओर ही नहीं ले जा रहे थे बल्कि उसके लिए एक ऐसे समृद्ध विश्व की संरचना भी निर्मित कर रहे थे जिसमें सभी मनुष्य एक ही परिवार के सदस्य हों। उनकी यह संरचना उस वैज्ञानिक युग के कारण संभव हो रही थी जिसमें किसी न किसी प्रकार से विज्ञान विभिन्न राष्ट्रों को नजदीक लाने में अहम भूमिका निभा रही थी और अब वे इसकी सफलता के लिए अध्यात्मिक धरातल पर एकता चाहते थे। इसी से प्रेरित होकर वे विश्व धर्म की कल्पना कर रहे थे जिसके द्वारा विश्व के भौतिक स्वरूप में आत्मा का संचार संभव हो सकता था।
डा. राधाकृष्णन के शिक्षा-दर्शन में धार्मिक, नैतिक एवं लोक कल्याणमय विचारों का सामंजस्य, भारतीय संस्कृति के प्रति उदारभाव तथा विश्व बंधुत्व की भावना को प्रमुखता प्राप्त है। वह समाज को ऐसे श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित रूप में विकसित करना चाहते थे जिसमें प्रत्येक मनुष्य को अपने योगदान का पूरा अवसर मिले, पर इसके लिए आवश्यक था कि मनुष्य अपने विचारों में श्रेष्ठ बने और इसके लिए शिक्षा ही एक मात्र साधन हो सकती थी। इसी के माध्यम से शिष्ट, चरित्रवान तथा स्वालंबी नागरिक का निर्माण संभव था। उनके अनुसार ‘‘शिक्षा केवल मस्तिष्क का प्रशिक्षण नहीं वरन् आत्मा का प्रशिक्षण है। इसका उद्देश्य ज्ञान और विवेक दोनों प्रदान करता है।’’
डा़ कृष्णन ऐसी शिक्षा नहीं चाहते थे जिसका केवल अकादमिक मूल्य ही हो बल्कि वे ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जिसका प्रयोग राजनैतिक स्तर पर भी किया जा सके। शिक्षा की प्रकृति निर्धारित करने हेतु उन्होंने दो विषय अपने सामने रखे प्रथम लोकतांत्रिक पद्धति और द्वितीय वैज्ञानिक भावना। उनका कहना था कि विद्यालय का कत्र्तव्य केवल सिद्धांत तैयार करना नहीं है बल्कि उसे देश के लिए श्रेष्ठ नेता भी तैयार करना है। इस धारा में चलने के लिए वे पश्चिम को हिकारत की नजर से नहीं बल्कि उसकी सफलता के कारणों को उनकी दिमागी ईमानदारी उनके सत्य के निश्छल अन्वेषण में देखने का प्रयास करते थे। उनकी नजर में सुकरात के समय से अब तक एकाध अपवादों को छोड़कर, आत्मतुष्टि, मानसिक आलस्य तथा अतीत के ज्ञान में अंध-श्रद्धा से पश्चिमी विद्वान बिल्कुल बचे रहे थे इसलिए यह संभव हो सका था। वे अपने देश के युवाओं के लिए ऐसा ही परिवेश चाहते थे।
उनकी शिक्षा में विज्ञान और धर्म एक दूसरे के पूरक से दिखायी देते हैं। उनके लिए, वह विज्ञान ही है जिसने करोड़ों की जिंदगी को आसान बना दिया था। उनके लिए वैज्ञानिकता कोई बाहरी और केवल अलंकारिक वस्तु नहीं है, बल्कि वह मस्तिष्क का ही अंग है, उसी का एक अविच्छेद्य अवयव है,जिसका उपयोग केवल व्यवहारिक जीवन तथा अवकाश की साधारण व्यवस्था में भौतिक पदार्थों के विवरण मंे, उद्योग धंधों में एवं खेती की उन्नति में ही नहीं करना चाहिए वरन उन बातों में भी करना चाहिए जो जाति के मन तथा उच्च आचरण से संबंधित हैं। हमारे वैज्ञानिक मस्तिष्क को कल्पनातीत ऐश्वर्य और घोर दरिद्रता के विपरीत दृश्यों से ही नहीं वरन अत्यधिक पवित्रता और मूर्खतापूर्ण अंधविश्वासों से भी ठेस पहुंचनी चाहिए। विज्ञान और धर्म के संघर्ष में वे सत्य पर आधारित विषय को स्वीकार करना बेहतर समझते थे। उनका कहना था कि आज हमारे देश में लाखों आदमी ऐसे हैं जो वैज्ञानिक यंत्रांे का उपयोग करते हैं फिर भी अंध-विश्वासों में उन्हें ईश्वर दत्त रहस्य ज्ञान बताकर अत्यधिक श्रद्धा रखते हैं और निरर्थक प्रथाओं को परंपरा के नाम से मानकर चलते हैं। इस संबंध में विज्ञान तथा धर्म में कोई वास्तविक झगड़ा भी नहीं है। भगवान हमसे यह नहीं कहता कि ‘‘मैं परंपरा हूँ’’ वरन् वह तो सिर्फ यह कहता है कि ‘‘ मैं सत्य हूँ ’’। यानी उनकी दृष्टि में धर्म कोई मतांतर नहीं वरन् ‘ सत्य के शोध’ की एक प्रक्रिया है जिसे शिक्षा से अलग कर देने सेे हमारी अध्यात्मिक मृत्यु हो जाएगी। इसलिए यह आवश्यक है कि हम सत्य का अनुसंधान करने वालों की भक्ति करें ना कि उनके अनुगत हो जाएं जो हमें प्रथाओं या परम्पराओं का दास बना देने का कार्य कर रहे हैं क्योंकि परम्परा कभी सत्य से श्रेष्ठ नहीं हो सकती, जो स्पष्टः अनुचित है वह रूढि़ अथवा आप्त-वाक्य होने से उचित नहीं हो सकती।
आधुनिक राज्य प्रणाली में वे विज्ञान को युक्ति के रूप में देखते जो विचार-क्षेत्र में बुद्धि अथवा विवेक का राज्य कायम करती है। लेकिन इसके लिए आचरण -क्षेत्र में समता की स्थापना अनिवार्य है और यह इसे कायम करना लोकतंत्र का उद्देश्य है क्यांेकि लोकतंत्र कोई राजनीतिक व्यवस्था अथवा शासन पद्धति नहीं है , बलिक वह तो जीवन अथवा व्यवहार का ढंग है, एक सक्रिय विश्वास है जो प्रत्येक कार्य, वचन तथा विचार को उत्साहित करता है, उसमें जान डालता है। इसके बावजूद यदि यह व्यवस्था बहुत बड़ी संख्या में शिक्षित नवयुवकों को काम नहीं दे सकती तथा उनकी रक्षा का उचित प्रबंध नहीं कर सकती, तो फिर वह दोषपूर्ण ही मानी जाएगी। व्यवस्था में दोष उसी समय प्रतिबिम्बित होन लगे थे क्योंकि वे देख रहे थे कि नवयुवक ऐसे वातावरण में पल रहे हैं जहां वर्गकृत अथवा संप्रदायकृत विद्वेश को प्रोत्साहन मिलता है। बचपन से ही उन्हें शिक्षा मिलती है कि वे अपने वंश या सम्प्रदाय की भक्ति बिल्कुल स्वाभाविक है। संकीर्णता बढ़ रही है और भद्दी प्रांतीयता को देशभक्ति अथवा मानवता-प्रेम के विरुद्ध अपराध नहीं गिना जाता। इसलिए वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो बचपन से ही व्यक्ति में निस्वार्थ सेवा-भाव, परदुख कातरता तथा सहानुभूति की भावना का विकास करे। वह अपने विचार तथा कार्य द्वारा परिवार, समाज राष्ट्र और विश्व मंे सुख, शांति, उत्थान तथा समृद्धि के लिए हर संभव प्रयास करे। इसके साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को उसके महत्व की अनुभूति कराकर उसमें मानवीय तथा जनतंत्रात्मक गुणों का विकास किया जाए जो आगे चलकर उसे राष्ट्र की एकता तथा उत्थान के लिए सक्षम और तत्पर बनाए। ऐसे में नैतिकता और आध्यात्मिकता एवं पाश्चात्य सभ्यता के साथ पूर्वी संस्कृति के समन्वय को भी अनवार्य मानते थे ताकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की श्रेष्ठ भावना का निर्माण संभव हो सके।
इस प्रकार डा. एस. राधाकृष्णन अपने चिंतन और शिक्षण से भारत के नागरिक को परम्पराओं और संकीर्णताओं से निकालकर एक विश्व नागरिक बनाने का प्रयास कर रहे थे जिसमें युक्ति, कर्म, वेदना, प्रेम और नैतिकता उन अनुपातों में समाहित हों जो विश्व को समृद्ध और स्थिर बनाने की राह निर्मित कर सके।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

लेकतंत्र को जिंदा रहने दो

जब हमारे देश के प्रधानमंत्री शाहजहाँनाबाद यानी लाल किले की प्राचीर से किसी तरह से पढ़-पढ़कर लोगों को अपनी बात बता रहे थे, तो बार-बार मन स्वयं से यह प्रश्न कर रहा था कि क्या यही है नेहरू और गांधी जी की विरासत ? उनकी वाणी की शक्ति उनका साथ देने में असमर्थ दिख रही थे, उनके चेहरे पर स्वतंत्रता की 65वीं वर्षगांठ का खुशी कम बल्कि चिंता के बल अधिक थे.....वह चिंता जिसके जिम्मेदार एक संवैधानिक व्यवस्था के प्रमुख होने के नाते बहुत हद तक वे स्वयं हैं। इस दृष्टि से देखें तो भ्रम की स्थिति बनती है कि हम इन 64वर्षों में कुछ शक्ति बटोर ताकतवर बने या फिर इतने निर्बल कि हमारा नेतृत्व सीधे अपने पैरों पर खड़ा होने में असमर्थ साबित हो रहा है। आज नेतृत्व अपने देश के लोगों को असंवैधानिक भाषा में और असंवैधानिक व अमर्यादित आचरण द्वारा लगातार सीख देने प्रहसन बार-बार दोहरा रहा है। अनशन करना, जनमत लेने की बात करना सरकार और उसके मीडियाई चेहरों को असंवैधानिक लगता है। उसके कुछ चारणी नुमाइंदे अन्ना जैसे कुछ भारतीयों से यह पूछने लगे कि वे हैं कौन ? यह सवाल तो साम्राज्यवादियों ने गांधी जी से भी नहीं पूछा था और न ही गांधी जी आंचरण पर ऐसे आरोप गढ़ने की लज्जास्पद गलती की थी ? अगर वे यही करते तो गांधी को तो हिन्दुस्तान में कोई जगह ही नहीं मिलती। वे कर सकते थे क्योंकि उनसे हमारा ऐसा सरोकार नहीं था जैसा हमारी आज की सरकार से है, फिर नहीं किया। फिर आज की सरकार को क्या हो गया, कि अपने ही लोगों से इस तरह पेश आने लगी कि शब्द और चेहरे उसका साथ नहीं दे पा रहे हैं। ......आज कांग्रेस उसी गांधी के नाम का बहुत कुछ खा रही है लेकिन उनका लिखा हुआ एक अध्याय पढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रही ? ऐसे लोगों से सिर्फ यही अनुरोध किया जा सकता है कि गांधी और नेहरू जी लिखे कुछ अक्षरों से भेंट कर लो और हमारे लोकतंत्र को जिंदा रहने दो...इसे सीरिया जैसी स्थिति में लाने का गुनाह न करो......जय हिंद!