शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

जिन पर हमें शर्म आती है

चाणक्य ने लिखा था कि जो लोग सच बोलना नही जानते वे वर्तमान भले ही सुधार लें लेकिन वे भविष्य बिगाड़ लेते हैं। आज भारत में एक अजीब सी प्रतियोगिता चल रही जिसका शीर्षक भले ही बहस के नाम का दिया जाता हो लेकिन असल में वह द्वंद होता ही। यह द्वंद ही जाति के अहम् का , यह द्वंद है धर्मं के इतिहास और श्रेष्ठता का , यह द्वंद स्वयं के लाभ कि पिपासु जिजीविषा का --------- इस सबने राष्ट्रीयता को इस कदर उधेडना शुरू कर दिया है कि उसका अपना सौंदर्य अब वीभत्सता में बदल गया। दिक्कत इस बात कि है कि ऐसा केवल हमारे राजनीतिज्ञ करते तो समझ में आ जाता क्योंकि उन्हें राजनीतिक लाभ चाहिए लेकिन ऐसा जब विश्व विद्यालयों में बैठे वे महानुभाव कर रहे है जिन्हें ऐसे करते हुए जरा सी शर्म नहीं आती । लेकिन देश के सामान्य नागरिक को उनसे घिन आती है। लिकिन यह वर्ग तो सभी जगह प्रभावी है सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर बौधिक प्रतिष्ठान तक में । इसने उन लोगों कि लिए कोई गुन्जाइस ही नहीं छोड़ी जो एक ईमानदार पहल कर सकते थे । किसी को जाति के नाम पर विशेषाधिकार चाहिए तो किसी को धर्मं के नाम पर . योग्यताएं तो अब मुह छुपाते फिर रही हैं क्योंकि उनके वंश, उनके परिवार का कोई उस सत्ता या बौद्धिक प्रतिष्ठान में बड़ा मनसबदार नहीं होता। दुर्भाग्य से उसके पास अतीत की कोई खास करुण गाथा भी नहीं होती जिसका मूल्य वह सरकार से लेकर समाज तक से मांग सके। तब भी क्या उम्मीद की जाय कि देश की ऐसी तस्वीर बनेगी की हम दुनिया पर छा जायेंगे। वैसे दिन में तारे देखने में हमें कोई हर्ज़ है क्योंकि जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का एक अध्यापक मायावती की मूर्ति अर्थव्यवस्था का सिर्फ़ इसलिए गुणगान कर सकता है क्योंकि वह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का प्राध्यापक होने के बावजूद अपने आपको उस मानसिकता से नहीं उबार पाया की वह दलित है। तो फ़िर किससे अपेक्षा की जा सकती है की कुछ लाभों के लोभ से मुक्ति पाकर देश हित में सोचने का सहस करेगा। खास बात यह हैं कि इन्ही भ्रमित बुद्धि वालों के सहारे भारत का भविष्य सुधारने का दावा किया जा रहा हैं । बहरहाल कुछ लोगों को ऐसे दिशाभ्रमित बुद्धिवादियों पर नाज़ हो सकता हैं लेकिन मुझे इन पर तरस भी आता हैं और शर्म भी ।