शुक्रवार, 1 मई 2009

डूबती-उतराती विरासतों के सहारे एक देश

बड़े दिनों से एक पाठ भारतीयों को रटाने की कोशिश की जा रही है की हम जल्दी ही दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनने वाले हैं । किसी भारतीय के लिए इससे अधिक गर्व की बात और क्या हो सकती है, लेकिन एक बात समझ में नहीं आती की यदि ऐसा सही है तो ८३६ मिलियन भारतीय २० रुपये से कम आमदनी पर जीवन यापन करने का अभिशाप क्यों भोग रहे हैं ? यह बात किसी पूर्वाग्रह से सम्पन्न होकर नहीं कही जा रही है बल्कि २००७ के असंगठित क्षेत्र के उद्योगों के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में यह बात स्वीकार की है । जिस देश की ७७ प्रतिशत आबादी भर पेट भोजन के लिए तरस रही हो वह विकसित कहने का नैतिक अधिकार तो नहीं रखता । मानव विकास सूचकांक पर नज़र डालें तो हम काफी पीछे हो चुके हैं। भारत इस स्केल पर श्रीलंका और भूटान जैसे देश से पीछे खिसक कर १३२ वें पायदान पर पहुँच चुका है , ब्राजील , इंडोनेशिया, चाइना और साउथ कोरिया की तो बात ही छोड़ दीजिये । विश्व बैंक द्वारा निर्धारित ग्लोबल पावर्टी लाइन के आधार पर ४५६ मिलियन यानि ४२ प्रतिशत भारतीय गरीबी रेखा के नीचे हैं । इस हिसाब से दुनिया का हर तीसरा गरीब भारत में निवास करता है। इसके बाद में समझ में नहीं आता की आख़िर विकसित कहे जाने या होने का मंत्र क्या है
हाँ एक बात है जो हमें आगे पहुँचने में खासा योगदान दे सकती है , वह है आंकडों की बाजीगरी और साझा षडयंत्र । इस दिशा में होने वाली बाजीगरी का एक नमूना एनयसयसओ द्वारा निर्धारित स्केल में देखा जा सकत है जहाँ यह सुनिश्चित हुआ है की जो भारतीय ग्रामीण ३५६.३५ रुपये और जो शहरी ५३८.६० रुपये पाते हैं वे गरीब नहीं हैं । क्या हमारे नीतिकारों और आंकड़ेबाजों से कोई यह नहीं पूछना नहीं चाहेगा की आज ३५० रुपये में १० दिन तक एक व्यक्ति खाना नहीं खा सकता तो फिर ऐसे आंकड़े पेश करके आख़िर हमारे नीतिकार क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? अभी तक जेहन यह विश्वास समाया था की अगर राजनीति भ्रष्ट हो जायेगी तो उसे बेपर्दा कराने के लिए मीडिया तो है ही लेकिन २००९ के आम चुनाव में मीडिया ने जिस तरह की भूमिका निभाई उससे बड़े ही भयावह भविष्य की तस्वीर का खाका खींचता दिखाई दे रहा । पूरे देश की स्थिति तो बयां नही का जा सकती लेकिन लखनऊ की सच्चाई मैंने बड़े नज़दीक से देखा। लखनऊ के लगभग सभी समाचार पत्रों ने एक प्रत्याशी का विज्ञापन ख़बर की तरह छापा, हालाँकि मीडिया से जुड़े लोग इस बात को भली भांति जानते थे की विज्ञापन है लेकिन आम नागरिक इसे ख़बर ही जानता रहा। इसमे कोई गुनाह नही लेकिन जिस तरह से मैंने उस प्रत्याशी के खर्च को अपनी जिस सीमित बुद्धि से देखा उससे तो लगा की यह समाज सेवा नहीं हो सकती ? क्या वह व्यक्ति यह बता सकता है की होली और दीवाली पर प्रत्येक घर में एक-एक कटोरदान में कुछ सामग्री पहुचना , स्कूल में बच्चों को पेंसी बॉक्स बांटना इस चुनावी मुहीम का हिस्सा नहीं था ? अगर यह सब उसी का हिस्सा था तो हमारी सजग मीडिया को दिखाई क्यो नहीं दिया जबकि उसके पास प्रत्येक गली कूचे की ख़बर रहती है । क्या मीडिया यह बता सकती है की दिन रात नैतिकता का राग अलापने वाली मीडिया इस षडयंत्र में क्यों शामिल हुई ? मीडिया ने इस प्रत्यासी के विज्ञापन को ख़बर बनाकर इसलिए छापा ताकि एक तरफ़ भारत के अज्ञानी लोगों को मूर्ख बनाकर प्रत्यासी के पक्ष में माहौल बनाया जा सके और दूसरी तरफ़ प्रत्यासी का चुनाव खर्च भी चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित रकम की वैध सीमा के अंदर ही बना रहे । यानि अखबारों ने सिर्फ़ अपने लाभ की खातिर इस षडयंत्र में शामिल होना स्वीकार कर लिया । क्या मीडिया यह जवाब दे सकती है की जिसने चुनाव पर कुल रकम १०० करोड़ से भी ज्यादा खर्च कर दी हो, वह क्या उद्देश्य लेकर संसद जाना चाह रहा है ? स्पस्ट तौर पर नहीं क्योंकि वह स्वयं उस षडयंत्र में शामिल है । फ़िर इस बात की क्या गारंटी है की कल इससे भी बड़े लाभ के लिए वह कोई कोई बड़ी सौदेबाजी नहीं कर लेगी। यदि सही है तो फिर फालतू में नैतिकता क्यों बघारी जाती है?
सौदेबाजी से सम्पन्न और नैतिक आचरण त्याग चुकी इन्हीं संस्थाओं को सरकार से लेकर वैश्विक संस्थाएं यदि विकसित होने वाले प्रचार की जिम्मेदारी सौंपें तो क्या यह नहीं हो सकता की ये वही प्रचार करेंगी जिससे इन्हें आर्थिक लाभ हो । इन स्थतियों में किस भविष्य की उम्मीद की जनि चाहिए ? हे भारत दासता शायद तेरी नियति है ! लाभ के लोभ में मदांध तेरे ही सपूत ही जब अपने दायित्व से भटक चुके हैं तो कोई कर भी क्या सकता है ?

1 टिप्पणी:

Dr. Amar Jyoti ने कहा…

बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है आपने। साधुवाद।