शनिवार, 18 अप्रैल 2009

विभ्रम की मनोदशा

राजनीतिज्ञ और बद्धिजीवी कहते हैं कि वोट जरूर दो, बिना किसी झिझक के क्योंकि लोकतंत्र में हमारा यह पवन दायित्व है, जिसकी पूर्ति हमें कोई भी आहुति देकर करनी चाहिए । लेकिन मैंने जब महात्मा को पढ़ा था तो एक बात जो सबसे अच्छी लगी थी वह यह, कि कोई कार्य ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे अपने ही ऊपर हिंसा हो ।
गौर से देखें तो अन्तःदलीय लोकतंत्र समाप्त हो गया है और राजनीतिक विचारधारा पूरी तरह से मर चुकी है । अब मरी हुई विचारधारा के अनजान नुमाइंदों में से किसी एक को चुनना क्या मेरी प्रतिबद्धता होनी चाहिए ? अगर उत्तर हाँ में है तो फिर मै समझ लूँगा कि हमारे देश के होनहारों ने गाँधी जैसे महात्मा की सही मायने में हत्या कर दी और मध्यकालीन या गुलामी कि मानसिकता वाले तत्वों की पुनः प्रतिष्ठा कर दी जिनके विरुद्ध गाँधी जैसे महात्मा करो या मरो भी कहने में कोई संकोच नही कर पाए । थोडी देर के लिए हिंसा कि इस शब्दावली से भी उन्होंने मुंह फेर लिया।
सवाल यह उठता है कि आख़िर ६ दशक के लोकतंत्र में हम ऐसे मुकाम पर क्यों पहुँच गए जहाँ हमें अधिकांश छल कपट करने वाले नेताओं से सामना करने को विवश होना पड़ रहा है। विचारधारा के नाम पर शून्य कि स्थिति है । पता ही नही चलता कि कब कौन किस दल कि वैचारिक दरिया में डूब गय। पंथनिरपेक्षता के नाम पर सारे अपराध माफ़ हैं । कोई देश बेच दे, किसी का कोई भी आपराधिक रिकार्ड हो , उसे मंत्रिपरिषद तक पहुचने में कोई दिक्कत नहीं होगी अगर वह तथाकथित सेकुलर है। इन्हे राजनीतिक विवशता स्वीकार कर सकती है लेकिन हम क्यों स्वीकार कर लें ? हमारी तो कोई राजनीतिक विवशता नहीं है। हम अगर योग्य प्रतिनिधियों के अभाव में मत देने के लिए विवश किए जाते हैं तो यह हिंसा होगी। पहले राजनीतिक चरित्र का निर्माण कर लिया जय तत्पश्चात हमें मतदान के लिए विवश किया जाए तो यह लोकतंत्र के अनुरूप होगा, अन्यथा इसे अपराध कि संज्ञा दी जानी चाहिए , एक ऐसे अपराध की जो हमारे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है ।
हम तो बहुत पहले से नकारात्मक वोट की मांग कर रहे हैं , लेकिन हमारे राजनीतिज्ञ ऐसा करने का साहस ही नहीं जुटा प् रहे हैं । हालाँकि अभी भी १९६१ के जन प्रतिनिधित्व की धारा ४९(0) हमें नकारात्मक वोट का अधिकार देती है लेकिन यह मतदाता की पहचान बता देती है । यह गुप्त मतदान के विपरीत हैं । हमारा संविधान हमें अनुच्छेद १९(अ) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है जिसमे केवल 'हाँ' कहने का ही अधिकार नही है बल्कि 'न ' कहने का भी अधिकार शामिल है।
बहरहाल तर्क और कुतर्क की श्रंखला का कोई अंत नहीं है, इनकी कडियाँ कभी टूटती नहीं भले ही वे विपरीत प्रकृति वाली हों । बहरहाल लखनऊ में मुझसे ऐसे किसी प्रत्यासी ने मत अपने पक्ष नहीं माँगा जो मेरा मत पाने के योग्य हो । जिन्हें हम विज्ञापनी संस्कृति के जरिये देख रहे हैं उन्हें मत देने में अपराध बोध होता हैं इसलिए आज की तिथि में तो यही निर्णय है की इन प्रत्याशियों को मत देकर हम अपने मन और ह्रदय पर हिंसा नहीं करना चाहते इसलिए यह मान लिया जय की हम नकारात्मक मत दे रहे हैं। इसके लिए कोई भी हमें कायर कह सकता है लेकिन मैं अपने महात्मा के असहयोग का अनुशरण मातृ कर रहा हूँ ।