शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

मूल्यों के खात्मे के गुनाहगार

पूरी दुनिया आज मंदी की चपेट में है , सभी देख भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं । सरकारें भ्रष्ट मुनाफाखोरों के लिए धन वर्षा कर रही हैं और आम आदमी एक- एक रोटी के लिए तरस रहा है । समझ में नही आता की सरकारें लोगों के लिए हैं या फिर भ्रष्ट धनियों के लिए ? अमेरिका अरबों डॉलर पूंजीपतियों और उनकी भ्रष्ट निकम्मी संस्थाओं के लिए दान दे चुका है, यही हाल भारत जैसे समाजवादी संविधान को अपनाने वाले देश का भी है । अफ़सोश यह की २३१ मिलियन लोग भूख से मरने के लिए मजबूर हैं । उड़ीसा , मध्य प्रदेश , बिहार , छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों की स्थिति अफ्रीका के इथियोपिया और चाड जैसी है फिर भी हम गल बजा रहे हैं की हम २०२५ में दुनिया की महाशक्ति बन जायेगे। जानते हो यह कौन कर रहा है वही वर्ग और उसकी नीतियां जो जीरो मुनाफा वाली कम्पनियों को हीरो बन रहे थे। पता नही यह मुनाफा की संस्कृति इस दुनिया को कहा ले जायेगी। और तो और जो मार्क्स की घुट्टी पी कर बड़े ही वे भी अब स्मिथ और सैम की व्हिस्की पी कर मस्त हो रहे हैं । पिछले दिनों एक खुलासा पूंजीवादियों की चोरी का हुआ जिसमे जर्मनी की सीमेंस जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दुनिया भर की सरकारों को भ्रष्ट बनाकर बड़े - बड़े ठेके हासिल करने का गुनाह कर रही हैं। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ के शब्दों में इस घिनौने पूंजीवाद को किस तरह सहेजें ? आज हमारे समाज को जो हीरो बने हुए हैं उनकी स्थिति तो हमारे प्राचीन और मध्य कल की विषयों से भी बदतर हैं । वे स्वयं को वैश्य की श्रेणी में रखकर भी इस देश के अस्तित्व को बचा ले गई और इस देश के हीरो कहने के बाद भी देश को गुलाम बनाकर बेच देने पर तुले हुए हैं। मेरा तो यह मानना है की अब परिभाषाएं बदल देनी चाहिए । लेकिन बदलेगा कौन ? इस रोग से तो कमोबश सभी ग्रस्त हैं । अर्थव्यस्था को लगातार पढ़ने वाला मैं आज तक नही समझ पाया की आख़िर वे कंपनियाँ जो एक छोटी सी पूँजी लेकर बाज़ार में उतरती हैं और बड़े - बड़े शहरों में ताजनुमा गुम्बद वाले भवनों में अपने दफ्तर खोलकर एक से दो लाख तक के वेतन पैर लोगों की नियुक्ति कर देखते ही देखते संजाल बिछा देती हैं । पूरे के पूरे शहर उनके विज्ञापनों से पट जाते हैं , यही नही टीवी पर भी इस देश के तथाकथित नायकों के साथ कुलांचे भरने लगती हैं , कोई बता सकता है कैसे ? आखिर इतना धन इनके पास कैसे से और दिसे आ जाता है ? जरिए क्या है ? यही स्थिति राजनेताओं की हो गई है । चुनाओ लड़ने से पहले ही वे इतना धन प्रचार पर खर्च कर देते हैं जितना की वाजिब तरीकों से कमाया ही नही जा सकता। एक युवा होनहार ने मुझे बताया की वह एक बिमा कम्पनी में कम करता है और १.५ लाख प्रतिमाह वेतन पता इसके बदले में उसे दो कम करने होते हैं एक अपने बॉस की गाली खाना और दूसरा किसी भी कीमत पे टारगेट पूरा करना । जनता का भी यही हाल है वोट देना और मार खाना । इसका मतलब यह हुआ आज की राजनीती और बाज़ार तंत्र दोनों की प्रकृति एक ही । सम्भव है की मकसद भी एक ही है ? तब तो दोनों में निकट सम्बन्ध भी होगा ? यह भी हो सकता है इनमे से कोई एक दुसरे की अवैध संतान हो ? अगर ऐसा है तो एक न एक दिन तो राज्य का पतन होना ही है क्योंकि जारज संतानों में राज्य संभालने का हुनर नहीं होता। अब लोगों को तय करना है की वे लोभ की नींद से जगाना चाहते हैं या अभी सोते रहने की इच्छा है ? अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों बात तो इसके बाद ही की जा सकती है ।

8 टिप्‍पणियां:

shama ने कहा…

Bohot gehrayeeese aapkaa lekh abhee nahee padha, par jitnaa padhaa wo swagat yogya lagaa....anek shubhkamnaayon sahit swagat hai...aur mere blogpe aanekaa snehil nimantranbhee...
word verification hataa den to achha rahegaa...
Mai ek baar phir gaurse padhne a jaungee.

सुशील दीक्षित ने कहा…

मैंने समयाब्भव में जल्दी जल्द पढ़ा पर लगता है कि आप से कुछ अच्छा मिलेगा भविष्य में पढने के लिए । शुभकामनाये

E-Guru Rajeev ने कहा…

हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं ई-गुरु राजीव हार्दिक स्वागत करता हूँ.

मेरी इच्छा है कि आपका यह ब्लॉग सफलता की नई-नई ऊँचाइयों को छुए. यह ब्लॉग प्रेरणादायी और लोकप्रिय बने.

यदि कोई सहायता चाहिए तो खुलकर पूछें यहाँ सभी आपकी सहायता के लिए तैयार हैं.

शुभकामनाएं !


"टेक टब" - ( आओ सीखें ब्लॉग बनाना, सजाना और ब्लॉग से कमाना )

ई-गुरु राजीव ने कहा…

आपका लेख पढ़कर हम और अन्य ब्लॉगर्स बार-बार तारीफ़ करना चाहेंगे पर ये वर्ड वेरिफिकेशन (Word Verification) बीच में दीवार बन जाता है.
आप यदि इसे कृपा करके हटा दें, तो हमारे लिए आपकी तारीफ़ करना आसान हो जायेगा.
इसके लिए आप अपने ब्लॉग के डैशबोर्ड (dashboard) में जाएँ, फ़िर settings, फ़िर comments, फ़िर { Show word verification for comments? } नीचे से तीसरा प्रश्न है ,
उसमें 'yes' पर tick है, उसे आप 'no' कर दें और नीचे का लाल बटन 'save settings' क्लिक कर दें. बस काम हो गया.
आप भी न, एकदम्मे स्मार्ट हो.
और भी खेल-तमाशे सीखें सिर्फ़ "टेक टब" (Tek Tub) पर.
यदि फ़िर भी कोई समस्या हो तो यह लेख देखें -


वर्ड वेरिफिकेशन क्या है और कैसे हटायें ?

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर…आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) ने कहा…

आदमी=मुनाफाखोरी की एक मशीन
जीवन=लालच,दंभ,स्वार्थ,बेईमानी
आदमी+जीवन=अपने लालच+स्वार्थ+अंहकार के पोषण के लिए किसी का भी जीवन बरबाद कर देना+मुनाफाखोरी के लिए निर्लज्जता और नीचता की हद तक गिर जाना

"VISHAL" ने कहा…

kya kare ? isi samaj me rahna hai,lekin itna prayas jaroor karta hu ki apne aap se kisi ko dukh na pahuche.

---------------------"VISHAL"

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आपको यहां पाकर मन प्रसन्‍न हो गया
समाचार पत्रों में तो अक्‍सर आपके चित्र
और लेखों से मुलाकात होती ही रहती है
वास्‍तव में आप शब्‍दों के रहीस/रईस हैं।