शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

जिन पर हमें शर्म आती है

चाणक्य ने लिखा था कि जो लोग सच बोलना नही जानते वे वर्तमान भले ही सुधार लें लेकिन वे भविष्य बिगाड़ लेते हैं। आज भारत में एक अजीब सी प्रतियोगिता चल रही जिसका शीर्षक भले ही बहस के नाम का दिया जाता हो लेकिन असल में वह द्वंद होता ही। यह द्वंद ही जाति के अहम् का , यह द्वंद है धर्मं के इतिहास और श्रेष्ठता का , यह द्वंद स्वयं के लाभ कि पिपासु जिजीविषा का --------- इस सबने राष्ट्रीयता को इस कदर उधेडना शुरू कर दिया है कि उसका अपना सौंदर्य अब वीभत्सता में बदल गया। दिक्कत इस बात कि है कि ऐसा केवल हमारे राजनीतिज्ञ करते तो समझ में आ जाता क्योंकि उन्हें राजनीतिक लाभ चाहिए लेकिन ऐसा जब विश्व विद्यालयों में बैठे वे महानुभाव कर रहे है जिन्हें ऐसे करते हुए जरा सी शर्म नहीं आती । लेकिन देश के सामान्य नागरिक को उनसे घिन आती है। लिकिन यह वर्ग तो सभी जगह प्रभावी है सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर बौधिक प्रतिष्ठान तक में । इसने उन लोगों कि लिए कोई गुन्जाइस ही नहीं छोड़ी जो एक ईमानदार पहल कर सकते थे । किसी को जाति के नाम पर विशेषाधिकार चाहिए तो किसी को धर्मं के नाम पर . योग्यताएं तो अब मुह छुपाते फिर रही हैं क्योंकि उनके वंश, उनके परिवार का कोई उस सत्ता या बौद्धिक प्रतिष्ठान में बड़ा मनसबदार नहीं होता। दुर्भाग्य से उसके पास अतीत की कोई खास करुण गाथा भी नहीं होती जिसका मूल्य वह सरकार से लेकर समाज तक से मांग सके। तब भी क्या उम्मीद की जाय कि देश की ऐसी तस्वीर बनेगी की हम दुनिया पर छा जायेंगे। वैसे दिन में तारे देखने में हमें कोई हर्ज़ है क्योंकि जब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का एक अध्यापक मायावती की मूर्ति अर्थव्यवस्था का सिर्फ़ इसलिए गुणगान कर सकता है क्योंकि वह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का प्राध्यापक होने के बावजूद अपने आपको उस मानसिकता से नहीं उबार पाया की वह दलित है। तो फ़िर किससे अपेक्षा की जा सकती है की कुछ लाभों के लोभ से मुक्ति पाकर देश हित में सोचने का सहस करेगा। खास बात यह हैं कि इन्ही भ्रमित बुद्धि वालों के सहारे भारत का भविष्य सुधारने का दावा किया जा रहा हैं । बहरहाल कुछ लोगों को ऐसे दिशाभ्रमित बुद्धिवादियों पर नाज़ हो सकता हैं लेकिन मुझे इन पर तरस भी आता हैं और शर्म भी ।

शुक्रवार, 1 मई 2009

डूबती-उतराती विरासतों के सहारे एक देश

बड़े दिनों से एक पाठ भारतीयों को रटाने की कोशिश की जा रही है की हम जल्दी ही दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बनने वाले हैं । किसी भारतीय के लिए इससे अधिक गर्व की बात और क्या हो सकती है, लेकिन एक बात समझ में नहीं आती की यदि ऐसा सही है तो ८३६ मिलियन भारतीय २० रुपये से कम आमदनी पर जीवन यापन करने का अभिशाप क्यों भोग रहे हैं ? यह बात किसी पूर्वाग्रह से सम्पन्न होकर नहीं कही जा रही है बल्कि २००७ के असंगठित क्षेत्र के उद्योगों के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में यह बात स्वीकार की है । जिस देश की ७७ प्रतिशत आबादी भर पेट भोजन के लिए तरस रही हो वह विकसित कहने का नैतिक अधिकार तो नहीं रखता । मानव विकास सूचकांक पर नज़र डालें तो हम काफी पीछे हो चुके हैं। भारत इस स्केल पर श्रीलंका और भूटान जैसे देश से पीछे खिसक कर १३२ वें पायदान पर पहुँच चुका है , ब्राजील , इंडोनेशिया, चाइना और साउथ कोरिया की तो बात ही छोड़ दीजिये । विश्व बैंक द्वारा निर्धारित ग्लोबल पावर्टी लाइन के आधार पर ४५६ मिलियन यानि ४२ प्रतिशत भारतीय गरीबी रेखा के नीचे हैं । इस हिसाब से दुनिया का हर तीसरा गरीब भारत में निवास करता है। इसके बाद में समझ में नहीं आता की आख़िर विकसित कहे जाने या होने का मंत्र क्या है
हाँ एक बात है जो हमें आगे पहुँचने में खासा योगदान दे सकती है , वह है आंकडों की बाजीगरी और साझा षडयंत्र । इस दिशा में होने वाली बाजीगरी का एक नमूना एनयसयसओ द्वारा निर्धारित स्केल में देखा जा सकत है जहाँ यह सुनिश्चित हुआ है की जो भारतीय ग्रामीण ३५६.३५ रुपये और जो शहरी ५३८.६० रुपये पाते हैं वे गरीब नहीं हैं । क्या हमारे नीतिकारों और आंकड़ेबाजों से कोई यह नहीं पूछना नहीं चाहेगा की आज ३५० रुपये में १० दिन तक एक व्यक्ति खाना नहीं खा सकता तो फिर ऐसे आंकड़े पेश करके आख़िर हमारे नीतिकार क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? अभी तक जेहन यह विश्वास समाया था की अगर राजनीति भ्रष्ट हो जायेगी तो उसे बेपर्दा कराने के लिए मीडिया तो है ही लेकिन २००९ के आम चुनाव में मीडिया ने जिस तरह की भूमिका निभाई उससे बड़े ही भयावह भविष्य की तस्वीर का खाका खींचता दिखाई दे रहा । पूरे देश की स्थिति तो बयां नही का जा सकती लेकिन लखनऊ की सच्चाई मैंने बड़े नज़दीक से देखा। लखनऊ के लगभग सभी समाचार पत्रों ने एक प्रत्याशी का विज्ञापन ख़बर की तरह छापा, हालाँकि मीडिया से जुड़े लोग इस बात को भली भांति जानते थे की विज्ञापन है लेकिन आम नागरिक इसे ख़बर ही जानता रहा। इसमे कोई गुनाह नही लेकिन जिस तरह से मैंने उस प्रत्याशी के खर्च को अपनी जिस सीमित बुद्धि से देखा उससे तो लगा की यह समाज सेवा नहीं हो सकती ? क्या वह व्यक्ति यह बता सकता है की होली और दीवाली पर प्रत्येक घर में एक-एक कटोरदान में कुछ सामग्री पहुचना , स्कूल में बच्चों को पेंसी बॉक्स बांटना इस चुनावी मुहीम का हिस्सा नहीं था ? अगर यह सब उसी का हिस्सा था तो हमारी सजग मीडिया को दिखाई क्यो नहीं दिया जबकि उसके पास प्रत्येक गली कूचे की ख़बर रहती है । क्या मीडिया यह बता सकती है की दिन रात नैतिकता का राग अलापने वाली मीडिया इस षडयंत्र में क्यों शामिल हुई ? मीडिया ने इस प्रत्यासी के विज्ञापन को ख़बर बनाकर इसलिए छापा ताकि एक तरफ़ भारत के अज्ञानी लोगों को मूर्ख बनाकर प्रत्यासी के पक्ष में माहौल बनाया जा सके और दूसरी तरफ़ प्रत्यासी का चुनाव खर्च भी चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित रकम की वैध सीमा के अंदर ही बना रहे । यानि अखबारों ने सिर्फ़ अपने लाभ की खातिर इस षडयंत्र में शामिल होना स्वीकार कर लिया । क्या मीडिया यह जवाब दे सकती है की जिसने चुनाव पर कुल रकम १०० करोड़ से भी ज्यादा खर्च कर दी हो, वह क्या उद्देश्य लेकर संसद जाना चाह रहा है ? स्पस्ट तौर पर नहीं क्योंकि वह स्वयं उस षडयंत्र में शामिल है । फ़िर इस बात की क्या गारंटी है की कल इससे भी बड़े लाभ के लिए वह कोई कोई बड़ी सौदेबाजी नहीं कर लेगी। यदि सही है तो फिर फालतू में नैतिकता क्यों बघारी जाती है?
सौदेबाजी से सम्पन्न और नैतिक आचरण त्याग चुकी इन्हीं संस्थाओं को सरकार से लेकर वैश्विक संस्थाएं यदि विकसित होने वाले प्रचार की जिम्मेदारी सौंपें तो क्या यह नहीं हो सकता की ये वही प्रचार करेंगी जिससे इन्हें आर्थिक लाभ हो । इन स्थतियों में किस भविष्य की उम्मीद की जनि चाहिए ? हे भारत दासता शायद तेरी नियति है ! लाभ के लोभ में मदांध तेरे ही सपूत ही जब अपने दायित्व से भटक चुके हैं तो कोई कर भी क्या सकता है ?

शनिवार, 18 अप्रैल 2009

विभ्रम की मनोदशा

राजनीतिज्ञ और बद्धिजीवी कहते हैं कि वोट जरूर दो, बिना किसी झिझक के क्योंकि लोकतंत्र में हमारा यह पवन दायित्व है, जिसकी पूर्ति हमें कोई भी आहुति देकर करनी चाहिए । लेकिन मैंने जब महात्मा को पढ़ा था तो एक बात जो सबसे अच्छी लगी थी वह यह, कि कोई कार्य ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे अपने ही ऊपर हिंसा हो ।
गौर से देखें तो अन्तःदलीय लोकतंत्र समाप्त हो गया है और राजनीतिक विचारधारा पूरी तरह से मर चुकी है । अब मरी हुई विचारधारा के अनजान नुमाइंदों में से किसी एक को चुनना क्या मेरी प्रतिबद्धता होनी चाहिए ? अगर उत्तर हाँ में है तो फिर मै समझ लूँगा कि हमारे देश के होनहारों ने गाँधी जैसे महात्मा की सही मायने में हत्या कर दी और मध्यकालीन या गुलामी कि मानसिकता वाले तत्वों की पुनः प्रतिष्ठा कर दी जिनके विरुद्ध गाँधी जैसे महात्मा करो या मरो भी कहने में कोई संकोच नही कर पाए । थोडी देर के लिए हिंसा कि इस शब्दावली से भी उन्होंने मुंह फेर लिया।
सवाल यह उठता है कि आख़िर ६ दशक के लोकतंत्र में हम ऐसे मुकाम पर क्यों पहुँच गए जहाँ हमें अधिकांश छल कपट करने वाले नेताओं से सामना करने को विवश होना पड़ रहा है। विचारधारा के नाम पर शून्य कि स्थिति है । पता ही नही चलता कि कब कौन किस दल कि वैचारिक दरिया में डूब गय। पंथनिरपेक्षता के नाम पर सारे अपराध माफ़ हैं । कोई देश बेच दे, किसी का कोई भी आपराधिक रिकार्ड हो , उसे मंत्रिपरिषद तक पहुचने में कोई दिक्कत नहीं होगी अगर वह तथाकथित सेकुलर है। इन्हे राजनीतिक विवशता स्वीकार कर सकती है लेकिन हम क्यों स्वीकार कर लें ? हमारी तो कोई राजनीतिक विवशता नहीं है। हम अगर योग्य प्रतिनिधियों के अभाव में मत देने के लिए विवश किए जाते हैं तो यह हिंसा होगी। पहले राजनीतिक चरित्र का निर्माण कर लिया जय तत्पश्चात हमें मतदान के लिए विवश किया जाए तो यह लोकतंत्र के अनुरूप होगा, अन्यथा इसे अपराध कि संज्ञा दी जानी चाहिए , एक ऐसे अपराध की जो हमारे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है ।
हम तो बहुत पहले से नकारात्मक वोट की मांग कर रहे हैं , लेकिन हमारे राजनीतिज्ञ ऐसा करने का साहस ही नहीं जुटा प् रहे हैं । हालाँकि अभी भी १९६१ के जन प्रतिनिधित्व की धारा ४९(0) हमें नकारात्मक वोट का अधिकार देती है लेकिन यह मतदाता की पहचान बता देती है । यह गुप्त मतदान के विपरीत हैं । हमारा संविधान हमें अनुच्छेद १९(अ) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है जिसमे केवल 'हाँ' कहने का ही अधिकार नही है बल्कि 'न ' कहने का भी अधिकार शामिल है।
बहरहाल तर्क और कुतर्क की श्रंखला का कोई अंत नहीं है, इनकी कडियाँ कभी टूटती नहीं भले ही वे विपरीत प्रकृति वाली हों । बहरहाल लखनऊ में मुझसे ऐसे किसी प्रत्यासी ने मत अपने पक्ष नहीं माँगा जो मेरा मत पाने के योग्य हो । जिन्हें हम विज्ञापनी संस्कृति के जरिये देख रहे हैं उन्हें मत देने में अपराध बोध होता हैं इसलिए आज की तिथि में तो यही निर्णय है की इन प्रत्याशियों को मत देकर हम अपने मन और ह्रदय पर हिंसा नहीं करना चाहते इसलिए यह मान लिया जय की हम नकारात्मक मत दे रहे हैं। इसके लिए कोई भी हमें कायर कह सकता है लेकिन मैं अपने महात्मा के असहयोग का अनुशरण मातृ कर रहा हूँ ।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

मूल्यों के खात्मे के गुनाहगार

पूरी दुनिया आज मंदी की चपेट में है , सभी देख भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं । सरकारें भ्रष्ट मुनाफाखोरों के लिए धन वर्षा कर रही हैं और आम आदमी एक- एक रोटी के लिए तरस रहा है । समझ में नही आता की सरकारें लोगों के लिए हैं या फिर भ्रष्ट धनियों के लिए ? अमेरिका अरबों डॉलर पूंजीपतियों और उनकी भ्रष्ट निकम्मी संस्थाओं के लिए दान दे चुका है, यही हाल भारत जैसे समाजवादी संविधान को अपनाने वाले देश का भी है । अफ़सोश यह की २३१ मिलियन लोग भूख से मरने के लिए मजबूर हैं । उड़ीसा , मध्य प्रदेश , बिहार , छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों की स्थिति अफ्रीका के इथियोपिया और चाड जैसी है फिर भी हम गल बजा रहे हैं की हम २०२५ में दुनिया की महाशक्ति बन जायेगे। जानते हो यह कौन कर रहा है वही वर्ग और उसकी नीतियां जो जीरो मुनाफा वाली कम्पनियों को हीरो बन रहे थे। पता नही यह मुनाफा की संस्कृति इस दुनिया को कहा ले जायेगी। और तो और जो मार्क्स की घुट्टी पी कर बड़े ही वे भी अब स्मिथ और सैम की व्हिस्की पी कर मस्त हो रहे हैं । पिछले दिनों एक खुलासा पूंजीवादियों की चोरी का हुआ जिसमे जर्मनी की सीमेंस जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दुनिया भर की सरकारों को भ्रष्ट बनाकर बड़े - बड़े ठेके हासिल करने का गुनाह कर रही हैं। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ के शब्दों में इस घिनौने पूंजीवाद को किस तरह सहेजें ? आज हमारे समाज को जो हीरो बने हुए हैं उनकी स्थिति तो हमारे प्राचीन और मध्य कल की विषयों से भी बदतर हैं । वे स्वयं को वैश्य की श्रेणी में रखकर भी इस देश के अस्तित्व को बचा ले गई और इस देश के हीरो कहने के बाद भी देश को गुलाम बनाकर बेच देने पर तुले हुए हैं। मेरा तो यह मानना है की अब परिभाषाएं बदल देनी चाहिए । लेकिन बदलेगा कौन ? इस रोग से तो कमोबश सभी ग्रस्त हैं । अर्थव्यस्था को लगातार पढ़ने वाला मैं आज तक नही समझ पाया की आख़िर वे कंपनियाँ जो एक छोटी सी पूँजी लेकर बाज़ार में उतरती हैं और बड़े - बड़े शहरों में ताजनुमा गुम्बद वाले भवनों में अपने दफ्तर खोलकर एक से दो लाख तक के वेतन पैर लोगों की नियुक्ति कर देखते ही देखते संजाल बिछा देती हैं । पूरे के पूरे शहर उनके विज्ञापनों से पट जाते हैं , यही नही टीवी पर भी इस देश के तथाकथित नायकों के साथ कुलांचे भरने लगती हैं , कोई बता सकता है कैसे ? आखिर इतना धन इनके पास कैसे से और दिसे आ जाता है ? जरिए क्या है ? यही स्थिति राजनेताओं की हो गई है । चुनाओ लड़ने से पहले ही वे इतना धन प्रचार पर खर्च कर देते हैं जितना की वाजिब तरीकों से कमाया ही नही जा सकता। एक युवा होनहार ने मुझे बताया की वह एक बिमा कम्पनी में कम करता है और १.५ लाख प्रतिमाह वेतन पता इसके बदले में उसे दो कम करने होते हैं एक अपने बॉस की गाली खाना और दूसरा किसी भी कीमत पे टारगेट पूरा करना । जनता का भी यही हाल है वोट देना और मार खाना । इसका मतलब यह हुआ आज की राजनीती और बाज़ार तंत्र दोनों की प्रकृति एक ही । सम्भव है की मकसद भी एक ही है ? तब तो दोनों में निकट सम्बन्ध भी होगा ? यह भी हो सकता है इनमे से कोई एक दुसरे की अवैध संतान हो ? अगर ऐसा है तो एक न एक दिन तो राज्य का पतन होना ही है क्योंकि जारज संतानों में राज्य संभालने का हुनर नहीं होता। अब लोगों को तय करना है की वे लोभ की नींद से जगाना चाहते हैं या अभी सोते रहने की इच्छा है ? अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों बात तो इसके बाद ही की जा सकती है ।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2009

बेईमान पूँजीवाद, निखट्टू नेतृत्व और प्रतिबंधित लोग

पिछले दिनों पॉल क्रुगमैन ने अपने एक लेख में लिखा था ,'' बड़े लोगों के बीच भी उस शख्स को आदर्श मानने की फितरत होती है जो खूब सारा पैसा बना रहा हो।'' यही बात पिछले दिनों एक चीनी अखबार में दो विद्वानों चिंग कुआन ली और मार्क्स सेल्डन ने लिखी थी । इन दोनों ने लिखा था कि चीन ने पिछले तीन दशकों में जो प्रगति कि है उसमे चीनी युवाओं को सिर्फ़ यह प्रशिक्षण दिया गया है कि सफलता कि पूजा करो। इस सफलता से उनका मतलब सिर्फ़ धनी बनने से है क्योंकि उनकी नज़र में प्रसिद्धी पाने के लिए धनी बनना आवश्यक है। इसका मतलब तो यही हुआ कि धनी होते ही सारे दुर्गुण छुप जाते हैं यानि धन संपन्नता वह योग्यता है जो काले धब्बों की सर्जरी कर देती है। यही कारण है कि आज निश्चित - अनिश्चित स्रोतों से धन अर्जन कराने वाले अब समाज का आइना बन गए हैं। वह चाहे संसद में घूस लेने वाले संसद हों या घूस देकर प्रधान मंत्री की कुर्सी बचाने वाले हमारे राजनीतिक नायक या फ़िर बड़े अपराधी अथवा कारपोरेट क्रिमिनल्स। अब यही हमारे लम्बरदार /नम्बरदार हैं और सभी जन इन्हीं के चरणों की रज लेकर मोक्ष पाना चाहते हैं।
१९७० के दशक में पूंजीवादी इतिहास में एक नया अध्याय जुडा था , यह अध्याय अब तक काफी लोकप्रिय हो चुका है । इसी अध्याय में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने सरकारों में भ्रष्टाचार के बीज बोने की कराने की रवायतें लिखनी शुरू की थीं । बात उस समय की है जब एडवर्ड हीथ ब्रिटेन के प्रधान मंत्री हुआ करते थे । उस समय ब्रिटेन की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने अफ्रीका की कई सरकारों को घूस देकर ठेके प्राप्त किए और जो सरकारें नहीं मानी उनका तख्ता पलट करवा दिया। भन्नाए एडवर्ड हीथ ने तब इसे 'पूंजीवाद का घिनौना चेहरा' कहकर संबोधित किया था। अभी जर्मनी की एक कंपनी सीमेंस केk भी इसी तरह के कारनामे का खुलासा हुआ। रिश्वत के एक मामले में अमेरिका में उस पर ८० करोड़ डॉलर का जुरमाना किया गया। प्रतिभूति विनिमय आयोग ने उस पर आरोप लगाया कि कंपनी ने इस दशक के शुरुआती वर्षों में अनेक मुल्कों की सरकारी ठेके लेने के लिए वहां के अधिकारियों को १।४ बिलियन डॉलर की घूस दी थी । अगला नाम अमेरिका से आया और वह नाम था बर्नाड मैन्दाफ का। इसे कुछ समय पहले तक कोई नहीं जनता था लेकिन इसका सिक्का तब भी शेयर दलालों की नियामक संस्था नॅशनल असोसिएशन ऑफ़ सिक्युरिटीज डीलर्स पर चलता था । इसकी कारस्तानियों पर से तब तक सरकार ने परदा नहीं उठाया या वह ऐसा करने में नाकामयाब रही जब तक उसने अपने पुत्रों को अपनी कमाई का राज ख़ुद नहीं बता दिया , जबकि वाल स्ट्रीट जर्नल ने लगातार इसके खिलाफ लिखा । अगला नायक भारत से रहा। हालाँकि भारत की धरती पैर उपजा यह सपूत नही है , इसके पहले भी केतन पारिख , हर्षद मेहता और अब्दुल करीम तेलगी जैसे लोग अवतरित हो चुके हैं । फ़िर भी यह नाम अधिक आहात कराने वाला है क्योंकि भारत को जिस कारपोरेट क्षेत्र पर नाज़ है और जिसके बूते वह दंभ भरता है यह नम उस क्षेत्र से है । अब यह लगाने लगा है कि दुनिया समतल है इसीलिए स्वाभाविक तौर पर यह घटना अमेरिका और के बाद होनी ही चाहिए थी क्योंकि २०२५ तक भारत को दुनिया की आर्थिक बागडोर संभालनी है। ऐसे में भारत यदि जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों से पीछे रह गया तो यह शर्म की बात होगी । यह कमान संभाली रामलिंगम राजू और सत्यम कम्प्यूटर्स ने। लेकिन इसमे सिर्फ़ राजू ही नही है बल्कि परदे के पीछे बहुत कुछ छुपा है , शायद वह बाहेर भी न आ पाए । गौर से देखें तो हमारे देश की बैंकिंग व्यवस्था, वित्तीय बाज़ार, चार्टर्ड एकाउन्तेंत नाम की संस्था, अदि सभी की मिली भगत से यह संपन्न हुआ है। समझ में नहीं आता की बैंक में २०० रुपये का खता खुलवाने में बैंक नाकों चने चबवा देता है और उसे अपडेट करने और प्रमाणपत्र देने में इतनी तकनीकियों से गुजरना पड़ता है जैसे कि वह अदना सा खाता धारक बैंक लूटने की बन्दोवस्ती का प्रमाणपत्र ले रहा हो। फ़िर सत्यम के साथ ऐसा क्यों नही किया गया। वह कंपनी बाज़ार में कहती रही की उसके पास ५००० करोड़ जमा हैं और उसकी सालाना कमी ६०० करोड़ की है, इसे बैंक, सेबी मानते चले गए और लेखा - जोखा करने वाली संस्था उस पर अपनी मुहर लगाती गई। शायद इसलिए क्योंकि इन सबको यह भली भांति मालूम था की मरना तो उस अन्तिम व्यक्ति को है जिसकी जिंदगी भर की कमाई लाभ पाने के लिए लगी है । अब इस किस्म की चमक दिनों-दिन बढाती जा रही है जो आने वाले दिनों में अधिकांश काले धब्बों की सर्जरी कर देगी और ये काले धब्बे तब तक बहुत कुछ सोख चुके होंगे ।
इसे रोके भी कौन ? हमने तो अपनी आँखों गांधारी की तरह एक पट्टी बाँध रखी है इससे हमें खलनायक नायक दिखने लगे हैं । वे नचइये - गवैये जो अब कलाकार के नाम एक धब्बा बन चुके हैं , हमारे समाज के हीरो हैं । असल में कारपोरेट के मॉडल और समाज के संवेदनशील ठग हैं । हमारे खिलाड़ी जिन्हें आज के युवाओं ने अपना आदर्श बना लिया है क्रीज से हटते ही दिल मांगे मोर जैसी हुडदंगई करने में थोडी सी भी लाज महशूस नहीं करता। हमारे राजनीतिक दल अब नेता नही पैदा कर पाते। पता नहीं की अब ज़मीं बंजर हो गई है या नेतृत्व निर्वीर्य हो गया है ? आज के राजनीतिक दल अपनी अपनी कश्तियों को कुछ नचैयों- गवैयों के सहारे पर लगना चाहते हैं या फ़िर कुछ गुंडों की लठैती के बल पर । विचारों और विचारधाराओं की ताकत अब इनमें नहीं रही। इन्हें कुछ भी करने और कुछ भी कहने में लाज नहीं आती ।
ऐसे में क्या कोई बता सकता है , कि आम आदमी क्या करे ? अब यह प्रश्न फिर महत्त्वपूर्ण हो गया है कि राज्य /देश किसके लिए है ? लोकतंत्र के नायक, जिन पर राज्य के चलाने की जिम्मेदारी है वे निखट्टू क्यों होते जा रहे हैं और देश की १०० करोड़ से भी अधिक जनता इन्ही निखात्तुओं में से कुछ को चुनने के लिए बाध्य क्यों है ? बेचारी जनता करे भी तो क्या , वे जिनसे उम्मीद थी कि एक दिन इस देश और लोगों को खेवनहार बनेंगे वे कुछ कदम चलकर ही बहकने लगे ? इन स्थितियों में किस तरह के भविष्य की उम्मीद की जा सकती है ?