सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

अमेरिका का नया पैंतरा : डॉ. रहीस सिंह

opinion
बीती 16-17 तारीख को कथित तौर पर अमेरिका से व्यथित तीन देशों के राष्ट्र प्रमुख नई चुनौतियों से निपटने के लिए इस्लामाबाद में वार्ता की मेज पर एक साथ दिखे। पाकिस्तान के रणनीतिकार और बुद्धिजीवी तो यह मान रहे हैं कि इस्लामाबाद में तीन देशो के नेताओं के मिलने का उद्देश्य अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रजंटेटिव द्वारा बलूचियों के लिए पास किए गए एक प्रस्ताव का विरोध करना मात्र था, लेकिन कुछ कूटनयिकों ने इन तीनों देशों को प्राकृतिक सहयोगी बताकर कुछ और ही संकेत दिया है? अब सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में पिछले दिनों इस्लामाबाद तीन पीडितों की आपसी व्यथा बांटने का गवाह बना या फिर तीन तथाकथित प्राकृतिक सहयोगियों द्वारा दक्षिण एशिया में अमेरिका के खिलाफ एकजुटता को प्रदर्शित करने का। इतिहास के एक लंबे दौर ने इन तीनों देशों को प्राकृतिक सहयोगी के रूप मे कभी नहीं देखा। इसलिए आज इनकी एकजुटता में कुछ खास शक्तियो के पर्दे के पीछे होनी की संभावना भी नजर आ रही है। वास्तव में तेहरान-इस्लामाबाद-काबुल की एकजुटता का मकसद क्या है, अभी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है।
अमेरिका से कथित तौर पर पीडितों की इस्लामाबाद में चर्चा के दो मकसद बताए जा रहे हैं। पहला-पाकिस्तान और अफगानिस्तान किस तरह से शांति की बहाली में एक-दूसरे की मदद करें। दूसरा है- पाकिस्तान और ईरान के मध्य रिश्तों को मजबूत बनाने वाला प्रारूप तैयार करना। हामिद करजई साहब इस बात को बार-बार दोहराकर शांति-प्रक्रिया को कामयाब बनाने की जुगत में दिखे कि पाकिस्तानी मदद उनके लिए सबसे अहम है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तानी मदद के लिए ऎसा प्रारूप न तो करजई के पास था और न ही किसी अन्य राष्ट्राध्यक्ष के पास, जिसमें यह बताया गया हो पाकिस्तान की भूमिका क्या होगी? तालिबान मामले में पाकिस्तान की मदद का सवाल है, तो यह विषय नया नहीं है और इससे पूरी दुनिया वाकिफ है कि तालिबान कौन है और उनके पोषण से लेकर संचालन तक में मूल भूमिका किसने निभायी। सभी जानते हैं कि जब तक पाकिस्तान नहीं चाहेगा, तब तक तालिबान के साथ करजई सरकार का तालमेल नहीं हो सकता। तालिबान मामले में ईरान किसी खास भूमिका को नहीं निभा सकता, इसलिए ईरान का इस्लामाबाद वार्ता में शामिल होना कुछ नए समीकरणों के बनने की ओर संकेत हो सकता है। ईरान का उस समय इस्लामाबाद और काबुल के साथ साझेदारी का प्रयास जब तेहरान की इजरायल और वाशिंगटन से तल्खियां बढ़ती जा रही हों, रक्षात्मक कवच की तलाश ज्यादा हो सकती है।
उल्लेखनीय है कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में बलूचिस्तान की सम्प्रभुता की मांग करने वाला संकल्प पारित कर दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि बलूचिस्तान वर्तमान में बिना किसी अपने सम्प्रभु अधिकार के पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान के बीच विभाजित है। कम से कम पाकिस्तान के राजनयिक यह मानते हैं कि अमेरिका इस समय सामरिक मोर्चे पर बहुत हद तक विफल हो रहा है, इसलिए वह बलूचों की स्वतंत्रता का नया दांव खेलकर इन देशों में विभाजनकारी शक्तियों को बढ़ावा देकर अपना उद्देश्य पूरा करना चाहता है। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अमेरिका कुर्दो की तरह बलूचों का प्रयोग करने में सफल हो जाए। दरअसल, बलूचियों का संबंध बलूचिस्तान से है जो सही अर्थो में उस क्षेत्र का नाम है, जो दक्षिण पश्चिम पाकिस्तान और दक्षिण-पूर्व ईरान तक विस्तृत है। मकरान तट पर स्थित महत्वपूर्ण रणनीति बंदरगाह ग्वादर के साथ ईरान, अफगानिस्तान और दक्षिण में अरब सागर इसकी बाहरी सीमाएं तय करते हैं और सुई के गैस के भंडार विश्व के बड़े गैस भंडारों का मुकाबला करते हैं। इस समृद्धि और महत्ता के बावजूद कुर्दो की तरह से बलूच भी बेहद उपेक्षित रखे गए हैं। बलूच न तो यह दर्द भूलें और न ही अस्तित्व की लड़ाई से पीछे हटे हैं।
अमेरिका इस बात को भली-भांति जानता है, इसलिए उसे लगने लगा है कि अब इस अवसर का लाभ उठाया जा सकता है। इस भयवश तेहरान और इस्लामाबाद प्राकृतिक सहयोगी होने का कृत्रिम दावा करने के लिए विवश हैं। इस्लामाबाद में हुई वार्ता के बाद पाकिस्तान के कूटनीतिक लेखकों ने अमेरिका की तरफ निशाना साधते हुए लिखा है कि पाकिस्तान और ईरान अमेरिका के लिए लीबिया, मिस्त्र और ट्यूनीशिया की तरह से प्रमुख लक्ष्य हैं। हालांकि इनमें अफगानिस्तान शामिल नहीं है, लेकिन कुछ मकसदों से ये काबुल को साझीदार बनाने की कोशिश में हैं। सवाल यह उठता है कि उपर्युक्त तीनों राष्ट्र लंबे समय से अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं, फिर तीनों आकर इस्लामाबाद में कैसे मिल गए? ध्यान देने योग्य बात यह है कि पाकिस्तान अपने अस्तित्व में आने के कुछ दिन बाद से ही अमेरिकी सैन्य संगठन का एक हिस्सा बन गया और अमेरिका से खूब धन व हथियार बटोरे, लेकिन आज दोनों के बीच में अविश्वास की खाई बहुत चैड़ी हो चुकी है। एबटाबाद और सलाल के सैन्य हमलों के बाद पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व की सार्वजनिक छवि जाती रही, सरकार पर संकट मंडराने लगा और जनता स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगी। पाकिस्तान का थिंक टैंक इसके लिए अमेरिका को दोषी मानता है। रही बात ईरान की तो उसने इस्लामी क्रांति के बाद से लगातार व्यापक अवज्ञात्क दृष्टिकोण अपनाया। बहरहाल, तीन व्यथित और डरे राष्ट्रों का इस्लामाबाद में मिलना पूर्णतरू सामान्य घटना नहीं लगती। इसमें सामरिक तंतुओं की मौजूदगी है। यह मौजूदगी कितनी प्रभावशाली सिद्ध होगी, यह तो आने वाला वक्त ही बता पाएगा।
(लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं)

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

कट्टरपंथ का दबदबा


डॉ. रहीस सिंह

मालदीव के उदार और लोकतांत्रिक रूप से चुने गए पहले राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद ने कई हफ्तों के राजनीतिक उथल.पुथल के बाद विद्रोहियों के साथ पुलिस के मिल जाने पर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र देते समय उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए जो बातें कहीए वे उनके उदात्त स्वभाव और लोकभावनाओं से उनके जुड़ाव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। उन्होंने कहा .ष्सड़कों पर हो रहे प्रदर्शन को कुचलने के लिए बल प्रयोग कर वह सत्ता में बने रहना नहीं चाहते। मैंने इसलिए पद से त्यागपत्र दियाए क्योंकि मैं उनमें से नहीं हूंए जो सत्ता का इस्तेमाल कर शासन में बने रहना चाहते हैं। मुझे लगता है कि यदि मैं सत्ता में बना रहता तो बल प्रयोग करना पड़ताए जिससे नागरिकों को नुकसान होता। यह भी संभव है कि हमें विदेशी प्रभाव का सामना करना पड़ता। मैंने हमेशा देश के लोगों का अच्छा चाहा हैए अब भी चाहता हूं और आगे भी चाहता रहूंगा।ष्
मोहम्मद नाशीद का लोकाधिकारों के लिए एक लंबा संघर्ष शायद उनके इस उदात्त निर्णय में सहायक हुआए जिसके जरिए वे दुनिया के तमाम तानाशाहों को भी एक संदेश दे गए। दरअसलए मोहम्मद नाशीद ने वर्ष 2008 मालदीव हुए पहले बहुदलीय चुनाव में तीन दशक से शासन कर रहे मौमेन अब्दुल गयूम को पराजित किया था। नाशीद लोकतंत्र समर्थक राजनीतिक कैदी रहे हैं और पर्यावरणविद् भी हैं। वर्ष 2008 में हुए चुनाव मालदीव में लोकशाही के पहले प्रयोग के रूप में देखे जा सकते हैं। इस पूर्णतरू इस्लामी देश में अन्य सभी आस्थाएं कानूनन वर्जित हैं। यहां सिर्फ सुन्नी मुसलमान ही नागरिक तथा मतदाता हो सकते हैं। इस राष्ट्र का शासकीय केन्द्र मस्जिद.ए.सुल्तान मुहम्मद है। इस लिहाज से वर्ष 2008 में मालदीव के राष्ट्रपति पद पर मोहम्मद नाशीद की विजय सूफीवादी उदार इस्लाम की फतह थी। खास बात यह है कि कट्टरपंथी तानाशाह अब्दुल गयूम ने उनके इसी उदात्त पक्ष को पिछले चुनाव मे पश्चिमी षड्यंत्र के रूप में भी पेश किया था। गयूम ने प्रचार किया था कि पश्चिमी देश उन्हें अपदस्थ कर मालदीव में ईसाईयत थोपना चाहते हैं।
हालांकि उस समय गयूम का हथकंडा असफल रहाए लेकिन कुछ दिन बाद ही मुस्लिम आतंकवादी वहां प्रकट होने लगे और अब्दुल गयूम अपनी नीतियों में कामयाब होते दिखे। मोहम्मद नाशीद ने राष्ट्रपति बनने के बाद कई प्रकार से मालदीव के संकट के बारे में दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। वर्ष 2009 में समुद्र के नीचे कैबिनेट की एक बैठक कर उन्होंने बिगड़ते पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता से दुनिया को अवगत कराने की कोशिश की। उन्होंने देश में उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करने के प्रयास किएए जो न केवल मालदीव की जनता के लिए बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए भी एक राहत भरा कदम माना जा सकता है। उन्होंने सार्क सम्मेलन में दक्षिण एशिया के देशों के समक्ष यह प्रतिबद्धता भी दिखायी थी कि मालदीव लोकतांत्रिक राह पर अग्रसर होकर विकास के मार्ग पर चलेगा। मोहम्मद नाशीद की लोकतंत्र के प्रति यह दृढ़ता उनके उस संघर्ष की देन हैए जो उन्होंने गयूम के तानाशाही के विरूद्ध लगभग पन्द्रह वर्ष तक किया।
मोहम्मद नाशीद के त्यागपत्र को एक सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। यह सही अर्थो में मालदीव में उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कट्टरपंथी ताकतों की विजय है। मालदीव के लोग चाहते हैं कि उनके देश का राष्ट्रपति ऎसा होए जो इस्लामी कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन करे और मोहम्मद नाशीद उनकी इस मंशा पर खरे नहीं उतर पा रहे थे। इस संपूर्ण प्रक्रिया के पीछे पाकिस्तान की अहम भूमिका रही। पाकिस्तान चाहता है कि मालदीव कट्टरपंथ का गढ़ बनेए ताकि वह अपनी भारत विरोधी गतिविधियों को मालदीव के जरिए अंजाम देने में कामयाब हो सके। गौरतलब है कि मालदीव के अधिकांश युवा उच्च शिक्षा के लिए पाकिस्तान का रूख करते हैं और वहां जाकर वे शिक्षा के साथ.साथ कट्टरपंथी इस्लामवाद विशेषताओं से संपन्न होकर वापस लौटते हैं। ये युवा पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित कट्टरपंथ की असल ताकत होते हैं। इन्हीं युवाओं के जरिए पाकिस्तान मालदीव की आंतरिक राजनीति पर नियंत्रण बनाए रखने का प्रयास करता है। इस विशिष्टता को देखते हुए ही शायद उसने 1988 में मालदीव का तख्तापलट करने की कोशिश भी की थीए जिसे भारत ने नाकाम कर दिया था।
गौर करें तो वर्तमान घटना भी पाकिस्तान की ही देन नजर आएगी। उल्लेखनीय है कि बीते नवंबर में दक्षेस शिखर सम्मेलन के दौरान दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सभी सदस्य देशों द्वारा अडू में कुछ स्मारक स्मृति चिन्ह के तौर पर बनाए गए थे। इस शहर के हिथाधू क्षेत्र में बने गए इन स्मृति चिन्हों में कुछ बौद्ध धर्म प्रतीक शामिल थे।कट्टरपंथियों ने इन्हें निशाना बनाया और इन्हें नष्ट कर दियाए लेकिन बात यहीं नहीं थमी। मालदीव सरकार द्वारा इस घटना पर खेद प्रकट करने के बाद स्थितियां और भी जटिल हो गई। खास बात यह रही कि विपक्षी पार्टियों विशेषकर अब्दुल गयूम की प्रोगे्रसिव पार्टी ऑफ मालदीव ने स्मारकों के ध्वंसकर्ताओं को राष्ट्रीय हीरो घोषित करते हुए सरकार के खिलाफ संघर्ष शुरू कर दिया। इसकी अंतिम परिणति राष्ट्रपति के इस्तीफे के रूप में हुई। मालदीव में सत्ता परिवर्तन को राजनय भले ही साधारण घटना के रूप में देखेए लेकिन वास्तव में यह मालदीव में कट्टरपंथ की विजय है। चूंकि मालदीव हिंद महासागर में रणनीतिक लिहाज से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैए इसलिए वहां पर उन ताकतों की विजय भारत के लिए बेहद चिंजाजनक होनी चाहिएए जिनका नजरिया भारत विरोधी और पाक समर्थक होता है।
(लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं)

कट्टरपंथ का दबदबा

कट्टरपंथ का दबदबा

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

सीरिया का काउंट डाउन

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सीरिया में सत्ताधारियों और सुधारवादियों के बीच संघर्ष जिस हिंसात्मक दौर में पहुंच गया है, और जिस तरह से वैश्विक दबाव एक आकार लेता दिखाई दे रहा है, उससे तो यही लगता है कि राष्ट्रपति बशर अल असद की भी उलटी गिनती शुरू हो गई है। सीरियाई राष्ट्रपति इसके उलट यह धमकी देते दिख रहे हैं कि उनके देश में किसी भी प्रकार की पश्चिमी सैन्य कार्रवाई भूकंप ला सकती है। इसे क्या माना जाए, उनका आत्मविश्वास या फिर अतिवादिता अथवा नासमझी?
सीरियाई राष्ट्रपति ने द संडे टेलीग्राफ को दिए साक्षात्कार में यह स्वीकार किया कि पश्चिमी सेनाओं का हम पर दवाब बढ़ रहा है, लेकिन किसी भी हस्तक्षेप से सीरिया एक और अफगानिस्तान में बदल सकता है। उनका कहना था कि इस क्षेत्र में सीरिया मुख्य केंद्र है, इसलिए यदि सीरिया में कोई समस्या होती है तो इसका असर पूरे इलाके पर पड़ेगा। उनका कहना था कि मिस्त्र और ट्यूनीशिया से सीरिया की स्थिति भिन्न है, इसकी राजनीति और इतिहास बिलकुल भिन्न हैं।

उनका यह बयान तब आया, जब सरकार विरोधी सीरियाइयों ने लीबिया की तरह सीरिया को नो फ्लाई जोन घोषित करने की मांग की और संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सीरिया में दमन समाप्त करने की बात दोहराई। सीरिया के मुख्य विपक्षी गुट ने आपातकालीन अपील जारी करके अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से हिंसा रूकवाने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है। असद अब भी गलतियां नहीं मान रहे हैं, क्योंकि उनका कहना है कि अब केवल आतंकवादियों को ही निशाना बनाया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि कि क्या राष्ट्रपति बशर अल असद द्वारा प्रयुक्त की जा रही आक्रामक शब्दावली के लिए यह उचित समय है? आंदोलन दिन-ब-दिन शक्ति पकड़ता जा रहा है और राष्ट्रपति बशर-अल-असद जनता की भावना के अनुरूप खरे नहीं उतर पा रहे हैं। लोकतंत्र की बहाली की मांग से इतर वे इस आंदोलन को घोर अलोकतांत्रिक तरीके से कुचलने की चेष्टा में लगे हुए हैं। मार्च के मध्य से अब तक दसियों हजार लोग बेघर हो चुके हैं और लगभग 3 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र और तमाम लोकतांत्रिक देशों द्वारा सीरियाई सरकार की गई निंदा का सरकार पर कोई असर नहीं हुआ। राष्ट्रपति बशर अभी भी यही कह रहे हैं कि सीरियाई सरकार सुधार की राह पर है, लेकिन ये सरकार का फर्ज है कि वो अपराधियों का सामना करे। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार की नजर में लोकतंत्र की आवाज उठाने वाले अपराधी हैं।
सीरियाई राष्ट्रपति के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें रूस भी चेतावनी दे चुका है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों रूसी राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव ने सीरियाई राष्ट्रपति असद से सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने या फिर पद से हटने के लिए स्पष्ट शब्दों में कहा था। हालांकि मेदवेदेव ने समय और पश्चिमी शक्तियों की मंशा को देखते हुए बड़ी सावधानी के साथ संयमित शब्दों में दबाव वाली भाषा का प्रयोग किया था। वे कहने से नहीं चूके कि शासन के भाग्य का निर्णय सीरियाई और वे लोग कर सकते हैं, जो सीरिया का राजनीतिक नेतृत्व कर रहे हैं, नाटो के कुछ सदस्य देशों या कुछ यूरोपीय देशों को इस तरह का निर्णय करने का अधिकार नहीं है।

दरअसल, पश्चिमी देश सीरिया पर यह आरोप लगा रहे हैं कि वहां कूटनीतिक शिष्टाचार का पालन नहीं हो रहा है और इसके प्रमाण भी देखने को मिले। रूस ही नहीं, पूरी दुनिया इस बात से वाकिफ है कि इन कारणों के बावजूद अमेरिका और यूरोपीय देशों की मंशा की पवित्रता पर यकीन नहीं किया जा सकता। अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान में लोकतंत्र का खूब तमाशा किया, उसके समर्थन से नाटो सेना अपना दायरा बढ़ाती गई और लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर छा लोकतंत्र या सैन्य नियंत्रित लोकतंत्र स्थापित करती गई। यही कारण है कि वहां की जनता अभी तक पश्चिम द्वारा स्थापित शांति व्यवस्था और लोकतंत्र से न तो संतुष्ट है और न ही उसमें सुरक्षित महसूस कर रही है। इसके बावजूद सीरिया की जनता पश्चिम से असद के खिलाफ सहायता की मांग कर रही है और उसे उम्मीद है कि पश्चिम की तरफ से कोई न कोई मदद अवश्य मिलेगी।
गद्दाफी की मौत के बाद विद्रोहियों या सुधारवादियों में गजब का आत्मविश्वास दिखने लगा है। हालांकि सरकार अपने आपको बचाने के लिए आंदोलन को कुचलने के लगभग सभी तरीके अपना रही है, लेकिन सच यह है कि सरकार की इस तरह की कार्य-प्रणाली विद्रोहियों को सरकार गिराने के लिए और उकसाने का कार्य कर रही है। इसी कार्रवाई का परिणाम है कि सरकार विरोधी आंदोलन अब प्रमुख नगरों से लेकर देश के अधिकांश भागों में अपनी पैठ बना चुका है। यही नहीं, अब सुरक्षा बलों के भीतर भी एक प्रवृत्ति दिख रही है, जो सरकार के लिए घातक हो सकती है। इनमें दलबदल और विरोधी इकाइयों मे शामिल होने या फिर उनका साथ देने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है, जो वहां की स्थितियों को और भी हिंसक बनाने का कार्य कर सकती है। ऎसे में एक-एक कर अरब देशों तथा उसके सहयोगियों का सीरियाई शासन के समर्थन से किनारा करना कुछ और संकेत देता है।
सीरिया ने अरब लीग के उस शांति समझौते को स्वीकार कर लिया था, जिसके तहत हिंसा रोकने और रिहाइशी इलाकों से सैनिकों को हटाया जाना था मगर ऎसा नहीं हुआ है। बल्कि सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद ने आंदोलनरत नागरिकों के लिए फरमान जारी किया है कि अगर वे एक सप्ताह से भीतर अपने हथियार सौंप देते हैं तो उन्हें माफ कर दिया जाएगा, लेकिन अमेरिका ने एक बयान जारी करके कहा है कि सीरियाई नागरिकों के लिए मौजूदा सरकार के सामने आत्मसमर्पण करना खतरनाक हो सकता है। अब रूस और चीन सहित तमाम खाड़ी देश भी सीरिया में जारी तबाही पर मौन समर्थन देने के दोष से मुक्त होने की मंशा व्यक्त कर चुके हैं और पश्चिमी शक्तियां पूरी तरह से उसके खिलाफ हैं। ऎसे में राष्ट्रपति असद के लिए बेहतर यही होगा कि आक्रामक व्यवहार को छोड़कर जनता की इच्छानुसार कार्य करने पर विचार करे, अन्यथा खूनी संघर्ष का लीबिया का इतिहास सीरिया में दोहराया जा सकता है।